भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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उत्पादनमपत्यस्य जातस्यगिरपालनम् । प्रत्यहं लोकायातायाः प्रत्युच्चंखीनिवन्धनम् ॥

बच्चे जनना, धर्म-कार्य करना, बीमारोमें तीमारदारी करना, उत्तम रतिमुख एवं पुरखोंके और अपने लिए स्वर्गकी प्राप्ति—ये सब काम एकमात्र स्त्री पर ही निर्भर हैं।

स्त्री ही बच्चे जनती है, जनकर वही उन्हें पालती है और घरके तमाम काम भी वही करती है। सभी कामोंमें वही गृहस्थ की एक मात्र सहायता करनेवाली है।

भाई! संसारकी उत्पत्ति ही स्त्री-पुरुषोंसे है। पितरोंका श्रृण चुकानेके लिए सन्तति की दरकार है। बिना पुत्रके कुलका नाम नहीं चलता और पुत्र बिना स्त्रीके हो नहीं सकता, इसलिए आप को विवाह अवश्य करना चाहिये। लोगोंके सम्मान-चुकानेसे मैं विवाह के लिए राजी हो गया। चूँकि मैं धनवान था, रूपवान था और कुलोत्तम था, इसलिये एक उत्तम कुलोत्तम की रूपवती कन्या मुझे मिल गई। यथा-विधि विवाह-कार्य सम्पन्न हो गया।

विवाह होनेसे पहले मेरे घरका काम नौकर-नौकरानियोंसे चलता था, पर स्त्रीने आते ही बरस दिनेके भीतर सबको धता बताई। वह कहा करती थी—‘मैं भी तो आपकी दासी ही हूँ। ऐसा कौनसा काम है, जिसे मैं नहीं कर सकती ? मैं सब काम कर सकती हूँ, फिर इनको रखकर धन नाश करनेकी

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