भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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क्या दरकार ? सिर्फ़ दो मियाँ-बीबियोंका खाना ही तो पकाना पड़ता है । मैं ब्राह्मणको पुत्रों और ब्राह्मणको स्त्री हूँ ; अगर मुझ से इतनासा काम भी न होगा, तो क्या होगा ? इतनों अमीरी और आराम-तलशी अच्छी नहीं । स्त्रीका दिनभर हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहना, अच्छा नहीं । बेकाम बैठे रहनेसे मनमें सौ तरह के दुखे ख्यालात पैदा होते हैं । इसीसे बड़े लोग बहुरेडियोंको कभी खाली बैठने नहीं देते । घरमें कुछ भी काम नहीं होता, तो चरखा ही कतबते हैं ।

भैन अंगरेजी तो नहीं पढ़ी है, पर हिन्दीकी पाँचवीं पुस्तकमें पढ़ा है कि, वैजमिन फूँ कलिन महोदय कहा करते थे—“काहिली और घण्टिका टैक्स राजाओं और पालीमैण्टोंके लगाये हुए टैक्सोंसे कहीं बहुत ज़ियादा भारी होता है (1) ।” जीन पाल महाशयका कहना है कि, सुस्ती बहुतसो आपद-विपदोंका एक नाम है (2) । अंगरेजोंमें एक कहावत है कि, बेकारी कमजोर-दिलोंकी पनाह और बेवकूफ़ोंकी तातील है (3) । जर्मनोंमें भी एक कहावत है कि, सुस्ती संसारमें सबसे भारी फ़िज़ूलखर्चों है (4) । एनसेम महोदय कहते हैं,—“बेकारी ज़िन्दा आदमोंकी गोर है (5) ।” फूँच कहते हैं,—“आलस्य सारी दुश्मियोंकी जड़ है (6) ।” वर्डन साहब कहते हैं,—“काहिली या बेकारी शरीरोंकी पहचान है, शरीर और मनका विष है, शराबतकी दाया है, तालीमकी सौतेली माँ है, हानियोंको मुख्य जन्मदातृ है, सात भयानक पापोंमेंसे एक है, सौतानके आराम करनेका मुख्य गद्दा है