भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

( २६६ )

क्या दरकार ? सिर्फ़ दो मियाँ-बीबियोंका खाना ही तो पकाना पड़ता है । मैं ब्राह्मणको पुत्रों और ब्राह्मणको स्त्री हूँ ; अगर मुझ से इतनासा काम भी न होगा, तो क्या होगा ? इतनों अमीरी और आराम-तलशी अच्छी नहीं । स्त्रीका दिनभर हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहना, अच्छा नहीं । बेकाम बैठे रहनेसे मनमें सौ तरह के दुखे ख्यालात पैदा होते हैं । इसीसे बड़े लोग बहुरेडियोंको कभी खाली बैठने नहीं देते । घरमें कुछ भी काम नहीं होता, तो चरखा ही कतबते हैं ।

भैन अंगरेजी तो नहीं पढ़ी है, पर हिन्दीकी पाँचवीं पुस्तकमें पढ़ा है कि, वैजमिन फूँ कलिन महोदय कहा करते थे—“काहिली और घण्टिका टैक्स राजाओं और पालीमैण्टोंके लगाये हुए टैक्सोंसे कहीं बहुत ज़ियादा भारी होता है (1) ।” जीन पाल महाशयका कहना है कि, सुस्ती बहुतसो आपद-विपदोंका एक नाम है (2) । अंगरेजोंमें एक कहावत है कि, बेकारी कमजोर-दिलोंकी पनाह और बेवकूफ़ोंकी तातील है (3) । जर्मनोंमें भी एक कहावत है कि, सुस्ती संसारमें सबसे भारी फ़िज़ूलखर्चों है (4) । एनसेम महोदय कहते हैं,—“बेकारी ज़िन्दा आदमोंकी गोर है (5) ।” फूँच कहते हैं,—“आलस्य सारी दुश्मियोंकी जड़ है (6) ।” वर्डन साहब कहते हैं,—“काहिली या बेकारी शरीरोंकी पहचान है, शरीर और मनका विष है, शराबतकी दाया है, तालीमकी सौतेली माँ है, हानियोंको मुख्य जन्मदातृ है, सात भयानक पापोंमेंसे एक है, सौतानके आराम करनेका मुख्य गद्दा है

( ३०० )

एवं विन्ता और खेद ही नहीं इनके सिवा और औरभी बहुत-से रोगोंको बड़ा कारण है (7)।” स्पेनवाले कहते हैं, कि काहिली से दिलपर जड़ लगता है (8)। अब आप ही कहिये कि, मुझे आलस्य त्यागना चाहिये या आलसी होना चाहिये। यमील महाशयने ठीक ही कहा है कि, स्त्रीके हाथमें ही कुटुम्ब को रक्षा और नाश है। मुझे हर तरह घरका पैसा बचाना चाहिये। इन्सान काम करनेके लिए पैदा हुआ है। मौतके बाद आराम-ही-आराम है। देखिये मौलाना हालीने क्या कहा है :—

1. Idleness and pride tax with a heavier hand than kings and parliaments. Ben. Franklin.

2. Idleness is many gathered miseries in one name. Jean Paul.

3. Idleness is only the refuge of weak minds and the holiday of fools. Pr.

4. Idleness is the greatest prodigality in the world. Ger. Pr.

5. Idleness is the sepulchre of a living man. Anselm.

6. Idleness is the root of all evils. Fr. Pr.

7. Idleness is the badge of gentry, the bane of body and mind, the nurse of naughtiness, the stepmother of discipline, the chief author of mischief, one of the seven deadly sins, the cushion on which the devil chiefly reposes and a great cause not only of melancholy but of many other diseases. Burton.

8. Idleness rusts the mind. Sp. Pr.

( ३०१ )

फ़राग़त से दुनियामें दम भर न बैठो।

अगर चाहते हो फ़राग़त ज़ियादा ॥

है जानके साथ काम इन्हींके लिये।

बनती नहीं जिन्दगीमें बेकाम किये ॥

जीते हो तो कुछ कीजिये जिन्दों की तरह।

मुर्दों की तरह जिये, तो क्या खाक जिये ॥

अगर आप चाहते हैं कि हम आरामसे रहें, तो दम-भर भी ख़ाली मत बैठो—क्षणभर भी बेकार मत रहो।

आदमीकी जानके साथ काम लगा हुआ है। जिन्दगीमें बिना काम किये काम नहीं चलता।

जीते हो तो जिन्दोंकी तरह काम भी करो। मुर्दोंकी तरह जीनेसे क्या फ़ायदा ?

मैं अपनी बीबीकी पाण्डित्य-पूर्ण बातें सुनकर दंग हो गया। आज मुझे मालूम हुआ कि, मेरी पत्नी कोरी रूपवती ही नहीं—पूण विदुषी और गुणवती है। ऐसी सुलक्षण स्त्री पानेसे मैं अपने तईं भाग्यवान् समझने लगा। हाँ, इतना ज़रूर हुआ कि, पुराने नौकरोंके विदा करते समय, मेरे दिलमें एक तरहकी वेदना हुई, पर धोरे-धोरे इन बातोंको भूल गया। फिर भी, उनमेंसे यदि किसको मैं कष्ट पाते देखता, तो अपने यहाँसे खानेको आटा दाल वगैरः दिलवा दिया करता, क्योंकि मेरे यहाँ इन चीज़ोंकी कमी नहीं थी।

( ३०२ )

मेरी स्त्री सबेरे ही मुझसे बहुत पहले उठती, घर को साफ करती, बर्तन मलती, बीजोंको यथास्थान रखती, समय पर सुन्दर सुखादु भोजन बनाती, मुझे बड़े स्नेहसे परोसकर खिलाती, रातको मेरे पाँव दाबती और जब तक मेरी आँख न लगनी, पाँव दाबती ही रहती। बहुत क्या, वह मुझे हर तरहसे सन्तुष्ट रखती थी। दिन-पर-दिन-उसकी श्रद्धा-भक्ति मुझमें बढ़ती ही जाती थी। इतकिर मुझे भी उस पर मुग्ध होना पड़ा। पति-प्राणा और सती-साध्वी स्त्री पाकर कौन प्रसन्न नहीं होता? कौन अपने भाग्य की सराहना नहीं करता?

यद्यपि स्त्रीके मुँह-सामने स्त्री को तारीफ करना नीति-काराने बुरा कहा है, तोभी जब-कभी उस की सेवासे मेरी अन्तरात्मा बहुत ही प्रसन्न और सन्तुष्ट हो उठती, मैं उसके सामने हो उस की बड़ाई करने लगता। मेरी प्रशंसापूर्ण बातें सुनकर वह सिर नीचा कर लेती और कहती—“पतिदेव! आप मेरे परमेश्वर हैं। मेरा तन-मन-धन सर्वस्व आप पर निष्ठावर है। हमारे भारतमें ही सीता, सावित्री, द्रौपदी, दमयन्ती और गान्धारी प्रभृति अनेकों प्रातस्समरणीय पतिव्रताएँ हो गई हैं, उनके मुकाबलेमें मैं तुच्छ हूँ। मैं आप की क्या सेवा करती हूँ? स्त्रीका धर्म ही पति-सेवा है। गोस्वामी तुलसीदास जीने कहा है:—

एकै धर्म एक व्रत नेमा ।

काय-वचन-मन पतिपदप्रेमा ॥

( ३०३ )

स्त्रीका एक ही धर्म, एक ही व्रत और एक ही नेम है कि, वह काय, वचन और मनसे पतिके वर्णोंमें प्रेम रखे।

“पराशर संहिता”में लिखा है—

दरिद्रं व्याधिरां मूर्खं भर्त्सारं वावमन्यते ।

सा मृता जायते व्याली वैधव्यं च पुनः पुनः ॥

जो स्त्री अपने दरिद्री, रोगी और मूर्ख पति की भी अवज्ञा करती है, वह मरने पर सार्पित होनी और कितने ही जन्मों तक उसे विधवा होना पड़ता है।

“मनुसंहिता”में लिखा है—

वैवाहिको विधिः क्षीणाम्, संस्कारो वैदिकः स्मृतः ।

पतितेवा गुरोवासो गृहार्थोऽविपरिग्निका ॥

स्त्रियोंके लिए विवाह ही उनका वैदिक संस्कार है, पति की सेवा ही उनके लिए गुरु-कुलवास है और घरके धन्ये करना ही अग्निहोत्र है।

और मी :—

भर्त्सा देवो गुरुर्भर्त्सा, धर्मं तीर्थं वतानि च ।

तस्मात्सर्वं परित्यज्य, पतिमेकं समर्चयेत् ॥

स्त्री अपने पति ही को देवता, पतिको ही गुरु, पतिको ही धर्म और पतिको ही व्रत समझे,—सबको छोड़कर केवल एक पतिको ही पूजे।

( ३०४ )

नास्ति स्त्रीणां प्रथक् यज्ञो न व्रत नाप्युपोषितम् ।

पतिं शुश्रूषते येन, तेन स्वर्गे महीयते ॥

शास्त्रोंमें स्त्रियोंके लिए यज्ञ, व्रत और पूजा—उपासनाको आज्ञा नहीं है। केवल पति-सेवासे ही उन्हें स्वर्ग मिलता है।

“पञ्चतंत्र”में लिखा है—

न सा स्त्रीत्यभि मन्तव्या यस्यां भर्ता न तुष्यति ।

तुये भर्त्तरि नारीणां तुष्टा स्युः सर्वदेवताः ॥

उसे स्त्री न समझो, जिससे कि उसका स्वामी खुश नहीं रहता। पति के प्रसन्न होनेसे स्त्री पर सब देवता प्रसन्न हो जाते हैं।

दावाग्निना विदग्धेव सपुण्यस्तवकालता ।

भस्मी भवतु सा नारी यस्यां भर्ता न तुष्यति ॥

जिस तरह फूल और फलोंके गुच्छेवाली लता दावाग्निसे भस्म हो जाती है; उसी तरह वह स्त्री नष्ट हो जाती है, जिसका पति प्रसन्न नहीं होता।

मितं ददाति हि पिता, मितं भ्राता मितं सुतः ।

अभितस्य हि दातारं भर्त्तरिं का न पूजयेत् ॥

पिता परिमित सुख देता है, भाई परिमित सुख देता है; लेकिन पति अमित सुख देता है, इसलिये अमित सुख देने वाले भर्त्ताकी पूजा कित्से न करनी चाहिये ?

( ३०५ )

उस दिन मैं अपनी प्यारी बीबीकी तकरीर सुनकर दिलो-जानसे खुश हो ही गया था ; आजकी तकरीर सुनकर मैं और भी सन्तुष्ट हुआ । बेसाख्ता मेरे मुँहसे “पञ्चतंत्र” का यह श्लोक निकल गया :—

पतिव्रता पतिप्राणा पत्युः प्रियहितेस्ता ।

यस्य स्यादीदृशी भाग्या धन्यः स पुरुषोमुचि ॥

जिसको स्त्री पतिव्रता है, पतिप्राणा है, पतिके प्रिय और हितमें तत्पर है, वह पुरुष पृथ्वी पर धन्य है ।

मैं ऐसी पतिव्रता का मिलना अपने पूर्व जन्मके पुण्योंका फल समझता था । मैं मन-हो-मन कहा करता था कि, यह स्त्री अवश्य ही मेरो पूर्वजन्मकी स्त्री है, तभी तो मुझे इतना चाहती है । कहा हूँ—

सती च योषित प्रकृतिश्च निश्चला

पुमांसमध्येति भवान्तरेण्वपि ॥

सती स्त्री और निश्चल प्रकृति जन्म-जन्मान्तरमें भी पुरुषके साथ रहती है । यही बात ठाक है । निश्चय ही यह मेरी पहले जन्मको भाग्य है ।

यों तो वह जिस दिनसे मेरे घरमें आई थी, उसी दिनसे मैं उस की खूब ख़ातिर करता था । वह जो कहती थी, सोई करता था ; जो माँगती थी, सोई ला देता था । लेकिन अब उस की

२०

( ३०६ )

श्रद्धा, भक्ति, प्रेम, स्नेह, पाण्डित्य और विद्वत्ता आदि अपूर्व गुणोंका परिचय पाकर उसका क्रीतदास ही होगा। मुकुपर मनु महाराजके निम्नलिखित श्लोकोंका बड़ा प्रभाव था :—

यत्र नार्थ्यास्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । यत्नेतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्वाङ्गला क्रियाः ॥ जामयो यानि गेहानि शपन्तथप्रतिपूजिताः । तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः ॥ तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनशानैः । भूतिकाभैर्निरित्यं सत्कारे प्रुत्सवेषु च ॥

जिन घरोंमें स्त्रियोंका आदर होता है, उन घरोंपर देवताओं की कृपा रहती है। जहाँ स्त्रियोंका आदर नहीं होता, वहाँ देवताओंके नाराज रहनेसे सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं।

जिस घरमें स्त्रियोंका निरादर होता है, उस घरकी स्त्रियाँ दुःखित होकर शाप दे देती हैं। उनके शाप या बहुदुःखासे वह घर इस तरह नष्ट हो जाता है, मानों किसीने बिप देकर सबको मार डाला हो।

इसलिए, जो पुरुष समृद्धि चाहते हों, उन्हें चाहिये कि नित्यप्रति उत्सव प्रभुत्विके समय गहने, कपड़े और खाने-पीनेके पदार्थोंसे स्त्रियोंकी पूजा करें—उनका सत्कार करें।

मैं अक्षर-मक्षर मनुमहाराजकी आज्ञा पर चलता था।

( ३०७ )

घरमें सोने-चाँदीके ज़ेवर तो पहलेसे ही थे। अब मैंने दीवालीके त्योहार पर, उसे कोई दो लाखके मोतियोंकी माला, हीरे पत्नेका हार और हीरेका काँटा प्रभृति अमूल्य गहने ला दिये। इतना ही नहीं, अपना सारा रुपया-पैसा उसके हाथमें देकर निश्चिन्त हो गया। आजकल मेरे दिन बढ़े ही आनन्दमें कट रहे थे।

एक दिन मैं अपने मित्रोंके साथ बैठकर हुक्का पी रहा था। बातों-ही-बातोंमें, मेरे सुँहसे अपनी स्त्री की तारीफ़की बातें निकल गईं। मैंने कहा—“भाइयो, मेरी स्त्री स्वर्गकी देवी और बड़ी ही सनी-साध्वी है। आजकल मुझे इस पृथ्वी पर ही स्वर्ग दीख रहा है। मुझे घरद्वार कहीं की किंक नहीं—मैं अपने सारे काम तुम्हारो भोजाईके हाथोंमें सौंप कर बेफिक हूँ।” एक मित्रने मेरी बात काट कर कहा—“शुक्रजी, घरसे एक-दम लापरवाह रहना अकृमन्दी नहीं। थोड़ा बहुत ख्याल रखा करो। शास्त्रमें लिखा है—

वृहस्पतेरपि प्राज्ञो न विश्वासे ब्रजेनरः।

य इच्छेदात्मनो बुद्धिमायुष्यञ्च सुखानि च ॥

जिस बुद्धिमानको अपनी आयु और सुखकी बुद्धिकी इच्छा-हो, उसे देवगुरु वृहस्पतिका भी विश्वास न करना चाहिये।

विश्वास तो किसीका भी न करना चाहिये, जिसमें स्त्रीका विश्वास तो किसी हालतमें भी न करना चाहिये। कहा है—

( ३०८ )

नदीनां नखीनां शृंगिण्यां शस्त्रपाणिनाम् । विश्वसो नैव कर्तव्यः स्त्रीपुत्राजकुलेषु ॥

नदीका, नाखूनवाले पशुओंका, सौंगवाले जानवरोंका, हथियार बाँधनेवालोंका, स्त्रीका और राजकुलका विश्वास हरगिज़ न करना चाहिये ।

महाराजा भर्तृहरिने भी कहा है—

को वा वीचिषु बुद्धुदेषु च तडिल्लेखासु च स्त्रीषु च ज्वालामेघेषु च पन्नागेषु च सरिद्रेगेषु च प्रलयः ॥

जलकी तरंग, बुलबुले, बिजली, स्त्रीलोग, आगकी शिखा, साँप और नदीके प्रवाह में विश्वास करना सर्वथा अनुचित है ।

मैंने कहा—“मित्रवर ! आपकी बातको मिथ्या और असंगत नहीं कहता, पर पांचों उँगलियाँ समान नहीं होतीं ; संसारकी सभी ओरते बद्कार और व्यभिचारिणी नहीं हैं । इस जगत्में पिंगलासी कुलडा भो हैं और सीता सावित्रीसी सती भी हैं । जिस तरह मर्द भले और बुरे दोनों तरहके हैं ; उसी तरह स्त्रियाँ भी नेक और बद् हैं । मैंने कामशास्त्र पढ़ा है । मुझे सती और असती स्त्रियोंकी पहचान मालूम है । भिन्ने आपकी भाभीको खूब देख लिया है । वह सौ टक्क का बरा सोना है ।” मेरी बातें सुनकर वह चला गया, कुछ न बोला ;

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साल भर चैनसे कट गया । इस बीचमें किसने कुछ भी शिका- यत न की ।

एक दिन गाँवके कई आदमियोंके साथ मैं दो तीन कोस पर मेलेंमें गया । हमलोग वहाँसे लौटे आ रहे थे, कि एक और मित्रने कहा—“भाई स्त्री जाति बड़ी ही चालाक है । उसकी मायाको समझना बड़ा कठिन काम है । स्त्रोंके दिलमें क्या है, इस बातको देवता भी नहीं जानते, पुरुषकी तो ताकत ही क्या है, जो उसके मनकी जाने । स्त्री कितनी ही भक्ति क्यों न दिखावे, कितना ही प्यार क्यों न करे, उसे सदा सन्देहकी नजरसे देखना चाहिये । मैं समझता हूँ, मेरी स्त्री जेसी पतिव्रता है, संसारमें और नहीं है । अहा ! कैसी अच्छी बातें हैं ! केसा स्वर्गीय प्रेम है ! हम दोनोंका केसा मेल है ! लेकिन भाई यह हमेशा याद रखो, कि रोशनीके नीचे ही अंधेरा रहता है । जिसके हाथमें चिराग है, वह कुछ नहीं देख सकता ; बल्कि दूसरे ही देख सकते हैं कि, कहाँ ऊँचा है और कहाँ नीचा है । भाई ! साफ बात कहनेके लिए क्षमा करना । लोग तुम्हें निरा औरतका गुलाम कहते हैं । सुनते हैं, आपके घरमें कुछ गोल- माल है । परमात्मा करे, यह बात कृतई झूठी हो ; लेकिन तुम्हें होशियार अवश्य रहना चाहिये । एक बात और है, स्त्रिये तर्ज जो प्यार करे, उसकी कभी न कभी परीक्षा जरूर करनी चाहिये । भगवान् सबके दिलोंको भीतरी बातोंको जानते हैं, तोभी अपने भक्तोंकी परीक्षा लिया करते हैं । बिना

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परीक्षा तुम कैसे समझ सकते हो कि, तुम्हारी स्त्री तुम्हें प्यार करती है या धोखा देती है। अगर तुम्हारा यह ख्याल है, कि मैं हृष्टपुष्ट और बलिष्ठ हूँ, मेरी स्त्री मुझसे अवश्य सन्तुष्ट होगी,—तो यह आपकी भूल है। सुनिये शास्त्रकारोंने कहा है—

नाभिस्तुप्यति काष्ठानां, नापगानां महोदधिः ।

नान्तकः सर्वभूतानां, न पुंसां वामलोचना ॥१॥

काकेशौर्च वृत्तकारे च सत्यं,

सपेक्षाद्वान्तिः स्त्रीषु कामोपशान्तिः ।

क्रीवे और्थ्यं मध्ये तत्त्वचिन्ता,

राजा मिलं केन दृष्टं श्रुतं वा ? ॥२॥

यदन्तस्तन्म जिह्वायां यज्जिह्वायां न तद्विहः ।

यद्वितं तन्म कुर्वन्ति विचित्रचरिताः स्त्रियः ॥३॥

अन्तर्विषमया ह्येता बहिश्चैव मनोरमाः ।

गुञ्जाफलसमाकाराः स्वभावादेवयोषितः ॥४॥

तद्विता अपि दषडेन शल्लैरपि विखण्डिताः ।

न वशं योषितो यान्ति न दानैर्नचसंस्तवैः ॥५॥

काठोंसे आगकी तृप्ति नहीं होती, नदियोंसे समुद्रकी तृप्ति नहीं होती, सारे ही जीवोंसे कालकी तृप्ति नहीं होती और पुरुषोंसे स्त्रियोंकी तृप्ति नहीं होती ।

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कन्धेमें पवित्रता, उचारीमें सच, सर्पमें क्षमा, स्त्रीमें कामकी शान्ति, नपुंसकमें धीरज, शराबोमें तत्त्वविचार और राजामें मित्रता—ये बाते न किसीने सुनी-न देखीं।

जो स्त्रीके भीतर है वह उसकी जीभ पर नहीं है, जो जीभ पर है वह बाहर नहीं है। विचित्र चरित्रवाली स्त्रियोंसे भलाई नहीं होती।

स्त्रियाँ स्वभावसे ही चिरमिटिके फलकी तरह भीतरसे ज़हरीली और बाहरसे मनोहर होती हैं।

सोंटिसे मारनेसे, तलवारसे टुकड़े-टुकड़े करनेसे, देनेसे और तारीफ़ करनेसे—किसीसे भी स्त्री वशमें नहीं होती।

मित्रवर ! तुम तो कौन चोज हो, बड़े-बड़े बलवान भी स्त्रियोंके आगे कायर हो जाते हैं। वह चाहते हैं सो करते हैं और माँगती हैं सो देते हैं। महाराजा भर्तृहरि और पिंगला की बात क्या नहीं सुनीं ? कहा है,—

व्याकीर्णकेशरकरालसुखा भुगेन्द्रा

नागाश्रभूरिमदराजिविराजमानाः ।

मेघाविनश्वच पुरुषाः समरेषु शूराः

क्षीसन्निधौ परम कापुरुषा भवन्ति ॥

२३

न किं दद्यान् किं कुर्यात्क्षीभिः प्रत्यर्थितोनरः ।

अनश्वा यत्र हेषन्ते शिरः पर्वणिमुषिडतम ॥

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बिखरे हुए अयालोंवाला भयंकर-मुखाँ केशरी सिंह, अत्यन्त मद्दमत्त थाथो, बुद्धिमान और समर-शूर पुरुष भी स्त्रीके सामने परम कायर—डरपोक हो जाते हैं।

स्त्रीके चाहनेसे पुरुष क्या नहीं दे देता और कौनसा काम नहीं कर बैठता ? स्त्रोंकी इच्छासे पुरुष घोड़े न होने पर भी, घोड़ेकी तरह हींसते और अपनी पीठ पर नारीको चढ़ाकर चलते हैं तथा पर्वके दिन—सिर मुँडाकेकी ममानियत होने पर भी—सिर मुँडाकर स्त्रीके चरणोंमें गिरते हैं।

भाई ! स्त्री जब पुरुषको अपने क़ाबूमें कर लेती है, तब उसे मंदारीके बन्दरकी तरह इच्छानुसार नचाती है। पुरुष भी, कार्य-अकार्यका ज्ञान गँवाकर, उसकी इच्छा पर चलता है। खैर, बहुत हुआ ; आप एक बार मेरे अनुरोधसे भाभीकी परीक्षा अवश्य करें।” यह कह वह अपने घर चला गया। मैंने भी विचार किया, तो उसकी बातें ठीक जान पड़ीं। भगवान् सर्वज्ञ और अन्तर्यामी हैं। वे प्राणिमात्रके घटघटकी जानते हैं। उनसे कुछ भी छिपा नहीं है, इसवास्ते उन्हें अपने भक्तोंकी परीक्षा करनेकी ज़रूरत नहीं। फिर भी ; वे उनकी परीक्षा करते हैं और जो भक्त उनकी परीक्षामें पास या उत्तीर्ण हो जाते हैं, उन्हें वे अपना दास बनाते और सब तरहसे सुखी करते हैं। फिर ; मैं भी भगवान्की तरह अपनी स्त्रीकी परीक्षा क्यों न करूँ ? परीक्षा करनेमें हानि ही क्या है ? परीक्षाका फल मेरे बड़े काम आयेगा। अगर खरा सोना निकला, तो मैं अपने प्यारकी मात्रा

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शृङ्गारशतक

मैं पेड़ पर बैठा ही था कि, इतनेमें किसीने आकर खिड़कीके किवा खटखटाये और धीरेसे कहा—“कुरुणा ! किवाड़ खोल” । कुरुणा का खोका नाम था । कुरुणाने आकर दरवाजा खोल दिया । तब आगन्तुक ने कहा—“मैं थोड़ी देरमें नशोपत्त से टिचन होकर आता तुम खाने-पीने का इन्तज़ाम करो ।”

Popular Press—Calcutta.

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और भी बड़ा दूँगा । लोग भी फिर इस तरह की दिल बिगाड़ने-वाली बातें न बनायेँगे । भगवान् रामचन्द्र जानते थे कि, सीता एकदम निर्दोष है, खरा सोना है ; चन्द्रमा कलङ्गी है, पर सीता निष्कलङ्गी है । इतने पर भी, उन्होंने सीताको अग्नि-परीक्षा की । उसका नतीजा अच्छा ही हुआ । सीताका और उनका—दोनोंका ही मुँह संसारके सामने उज्ज्वल हुआ । मैं भी वैसे हो क्यों न कहूँ ?

इस तरह सोच-विचारकर, एक दिन मैंने अपनी लीसे कहा—“आज मुझे बड़ा ज़रूरी काम है । वह काम बिना बाहर जाये हो नहीं सकता ।” वह मेरी बात सुनते ही मेरे गले लगकर ज़ार-ज़ार रोने लगी और कहने लगी—“स्वामिन् ! आपका एक क्षणभरका वियोग भी मैं सहन नहीं कर सकती । आपके बिना मेरा जीवन ख़तरेमें समझिये । आप मुझे छोड़कर कहीं न जाइये ।” उसका उस समयका रोना-कलपना देखकर मेरा दिल कमज़ोर होने लगा । मैं मन-हो-मन कहने लगा—‘हाय ! मैं ऐसी सतीको क्या क्यों दुःख दे रहा हूँ ? लोगोंकी ऊल-जल्लूल बातोंमें आकर, मैं क्यों अपने सुखको मिट्टा कर रहा हूँ ? अच्छल हिमालय चलायमान हो तो हो सकता है, सुमेरु अपने स्थानसे डिगे तो डिग सकता है, सूर्य पूरबकी जगह पच्छिममें उगे तो उग सकता है, समुद्र अपनी मर्यादा उल्लङ्घन करे तो कर सकता है, अग्नि अपनी दाहक शक्ति त्यागे तो त्याग सकता है ; पर मेरी यह प्राणप्यारी-असती या कुलटा

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नहीं हो सकती। मैं ऐसे ही विचारोंमें गूँते जा रहा था कि, अन्दरसे मेरी अन्तरात्माने कहा—‘कदाचित तुम्हारा ख्याल ठीक हो, पर परीक्षा कर लेनेमें ही कौनसा हर्ज है ? एक बार परीक्षा कर लेनेसे सदाको वहम मिट जायगा। मैंने खीसे कहा—‘काम ज़रूरी न होता, तो मैं तुम्हें इतनी तकलीफ़ न देता। इस बार मुझे जाने दो, भविष्यमें कहीं न जाऊँगा।’ उसने कहा—‘तुम्हारे बिना मैं रातभर अकेली कैसे रहूँगी ? मुझे घर खानेको दौड़ेगा। अपने एकमात्र आश्रय तुम्हें छोड़कर मैं कैसे जीऊँगी ? तुम्हारे बिना मुझे एक पल प्रलयके समान मालूम होता है।’ यह कहते-कहते वह फिर फूट-फूटकर रोने लगी। उसकी कमलसी आँखोंसे गङ्गा-जमुनाकी सी धारें बहने लगीं। आँसुओंके मारे उसका आँचल और मेरा कुर्ता तर हो गये। मैंने कहा—‘बिना जाये काम न चलेगा, बड़ा नुकसान होगा। अब मेरे दिलको कच्चा न करो। श्यामाकी माँसे कहे जाता हूँ। वह आकर रातको तुम्हारे पास सो रहेगी।’ उसने कहा—‘नहीं, नहीं, मैं आपका नुकसान नहीं चाहती, आपका नुकसान भी तो मेरा ही नुकसान है। लाबारी है। आप चिन्ता छोड़िये। श्यामाकी माँको मैं ही बुला लूँगी। आप भगवान्का नाम लेकर यात्रा कीजिये। देखो, राह-बाटमें सब तरहसे होशियार रहना।’

मैं उसे दम-दिलासा देकर घरसे बाहर निकल गया। उस समय सन्ध्याके पाँच-साढ़े पाँच बजे होंगे। थोड़ासा दिन

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बाकी था। कुछ रात होने तक मैं इधर-उधर फिरता रहा। ज्योंही अन्यकारका पूर्ण राज्य हो गया, हाथको हाथ न सुकने लगा, मैं अपनी बिड़कीके सामने खड़े हुए इमलीके पेड़पर चढ़ गया। ध्यान रहे कि, मेरे घरके चारों तरफ एक चहारदीवारी थी। उस वृक्षसे मेरे घरका क़रीब-क़रीब बहुतसा हिस्सा दिखाई देता था। मैं पेड़ पर बैठता ही था कि, इतनेमें किसीने आकर बिड़कीके किवाड़ खटखटाये और धीरेसे कहा—“क़रुणा! किवाड़ खोल।” आनेवालेकी आवाज़ मेरी जानी हुई स्त्री मालूम हुई। क़रुणा मेरी स्त्रीका नाम था। क़रुणाने आकर दरवाज़ा खोल दिया। तब उस मर्दने कहा—‘मैं थोड़ी देरमें नशे-पत्तेसे टिचन होकर आता हूँ। तुम खाने-पीनेका इन्तज़ाम करो।’

यह कहकर वह आदमी चला गया। क़रुणा बिड़कीके किवाड़ बन्द करके, रसोईकी धुनमें लगी। सड़कपर सामने लाल्टेन जल रही थी। जब वह लाल्टेनके नज़दीक पहुँचा, तब मैंने रोशनीमें उसका चेहरा देखकर पहचान लिया। वह और कोई नहीं; हमारे पाड़ेका चौकीदार था। वह कभी-कभी मेरे घर आया-जाया करता था।

‘खाने पीनेका इन्तज़ाम करो’—इस फ़िक्रको सुनते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गये। शरीर धर-धर धर-धर कांपने लगा। ज़मीन घूमती हुई मालूम होने लगी। आँखोंके सामने अँधेरा छा गया। ऐसा मालूम होने लगा, मानो मैं अभी पेड़से नीचे

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गिर पड़ूँगा। थोड़ी देरमें अपने दिलको मज़बूत करके, मैं सम्हल बैठा और निश्चय किया कि, देखना चाहिये, आगे क्या होता है। कोई दो घण्टे बाद उसी चौकीदारने आकर फिर आवाज़ दी। आवाज़ सुनते ही कृष्णा दौड़ी आई और दरवाज़ा खोल दिया। दरवाज़ा खुलते ही, उसने कृष्णाको गोदमें उठा, उसका मुँह चूम लिया। इतना ही नहीं ; उसने द्वार पर ही उसे जोरसे छातीके चिपटा लिया और बोसे-पर-बोसे लेने लगा। फिर वह उसे गोदमें लिये हुए ही घरके भीतर दाबिल हो गया। मैं अन्दाज़से समझ गया कि, दोनों मेरे पलंग पर जा बैठे हैं। कुछ देरमें उनकी धीरे-धीरे आनेवाली आवाज़से मालूम हुआ कि, मज़ेमें गाना गाया जा रहा है। कभी-कभी हँसी-मजाक भी होता है। ऐसा मालूम होता था, मानो दोनों बेखटके हैं। उन्हें जरा भी डर या खौफ़ नहीं है।

इधर खिड़की तो बन्द कर दी गई, पर जल्दीमें साँकल बन्द नहीं की गई। उस समय मेरी तुरी हालत थी, कोधके मारे काँप रहा था। दिलमें इतना जोश आया कि, उसी समय उनके सामने जाकर खड़े हो जानेकी इच्छा होने लगी ; पर अकड़ कहती थी, जरा धीरजसे काम लो। इसलिये मनको रोक कर कहा—‘ओह ! यह तो परले सिरकी व्यभिचारिणी है, कुलटा है, नीच है, दूगाबाज़ है, बेवफ़ा है। इस पर क्रोध करने-से क्या फ़ायदा ? पिसेको पीसनेसे क्या लाभ ? जो हो गया