भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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परीक्षा तुम कैसे समझ सकते हो कि, तुम्हारी स्त्री तुम्हें प्यार करती है या धोखा देती है। अगर तुम्हारा यह ख्याल है, कि मैं हृष्टपुष्ट और बलिष्ठ हूँ, मेरी स्त्री मुझसे अवश्य सन्तुष्ट होगी,—तो यह आपकी भूल है। सुनिये शास्त्रकारोंने कहा है—

नाभिस्तुप्यति काष्ठानां, नापगानां महोदधिः ।

नान्तकः सर्वभूतानां, न पुंसां वामलोचना ॥१॥

काकेशौर्च वृत्तकारे च सत्यं,

सपेक्षाद्वान्तिः स्त्रीषु कामोपशान्तिः ।

क्रीवे और्थ्यं मध्ये तत्त्वचिन्ता,

राजा मिलं केन दृष्टं श्रुतं वा ? ॥२॥

यदन्तस्तन्म जिह्वायां यज्जिह्वायां न तद्विहः ।

यद्वितं तन्म कुर्वन्ति विचित्रचरिताः स्त्रियः ॥३॥

अन्तर्विषमया ह्येता बहिश्चैव मनोरमाः ।

गुञ्जाफलसमाकाराः स्वभावादेवयोषितः ॥४॥

तद्विता अपि दषडेन शल्लैरपि विखण्डिताः ।

न वशं योषितो यान्ति न दानैर्नचसंस्तवैः ॥५॥

काठोंसे आगकी तृप्ति नहीं होती, नदियोंसे समुद्रकी तृप्ति नहीं होती, सारे ही जीवोंसे कालकी तृप्ति नहीं होती और पुरुषोंसे स्त्रियोंकी तृप्ति नहीं होती ।