शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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साल भर चैनसे कट गया । इस बीचमें किसने कुछ भी शिका- यत न की ।
एक दिन गाँवके कई आदमियोंके साथ मैं दो तीन कोस पर मेलेंमें गया । हमलोग वहाँसे लौटे आ रहे थे, कि एक और मित्रने कहा—“भाई स्त्री जाति बड़ी ही चालाक है । उसकी मायाको समझना बड़ा कठिन काम है । स्त्रोंके दिलमें क्या है, इस बातको देवता भी नहीं जानते, पुरुषकी तो ताकत ही क्या है, जो उसके मनकी जाने । स्त्री कितनी ही भक्ति क्यों न दिखावे, कितना ही प्यार क्यों न करे, उसे सदा सन्देहकी नजरसे देखना चाहिये । मैं समझता हूँ, मेरी स्त्री जेसी पतिव्रता है, संसारमें और नहीं है । अहा ! कैसी अच्छी बातें हैं ! केसा स्वर्गीय प्रेम है ! हम दोनोंका केसा मेल है ! लेकिन भाई यह हमेशा याद रखो, कि रोशनीके नीचे ही अंधेरा रहता है । जिसके हाथमें चिराग है, वह कुछ नहीं देख सकता ; बल्कि दूसरे ही देख सकते हैं कि, कहाँ ऊँचा है और कहाँ नीचा है । भाई ! साफ बात कहनेके लिए क्षमा करना । लोग तुम्हें निरा औरतका गुलाम कहते हैं । सुनते हैं, आपके घरमें कुछ गोल- माल है । परमात्मा करे, यह बात कृतई झूठी हो ; लेकिन तुम्हें होशियार अवश्य रहना चाहिये । एक बात और है, स्त्रिये तर्ज जो प्यार करे, उसकी कभी न कभी परीक्षा जरूर करनी चाहिये । भगवान् सबके दिलोंको भीतरी बातोंको जानते हैं, तोभी अपने भक्तोंकी परीक्षा लिया करते हैं । बिना