भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( ३०८ )

नदीनां नखीनां शृंगिण्यां शस्त्रपाणिनाम् । विश्वसो नैव कर्तव्यः स्त्रीपुत्राजकुलेषु ॥

नदीका, नाखूनवाले पशुओंका, सौंगवाले जानवरोंका, हथियार बाँधनेवालोंका, स्त्रीका और राजकुलका विश्वास हरगिज़ न करना चाहिये ।

महाराजा भर्तृहरिने भी कहा है—

को वा वीचिषु बुद्धुदेषु च तडिल्लेखासु च स्त्रीषु च ज्वालामेघेषु च पन्नागेषु च सरिद्रेगेषु च प्रलयः ॥

जलकी तरंग, बुलबुले, बिजली, स्त्रीलोग, आगकी शिखा, साँप और नदीके प्रवाह में विश्वास करना सर्वथा अनुचित है ।

मैंने कहा—“मित्रवर ! आपकी बातको मिथ्या और असंगत नहीं कहता, पर पांचों उँगलियाँ समान नहीं होतीं ; संसारकी सभी ओरते बद्कार और व्यभिचारिणी नहीं हैं । इस जगत्में पिंगलासी कुलडा भो हैं और सीता सावित्रीसी सती भी हैं । जिस तरह मर्द भले और बुरे दोनों तरहके हैं ; उसी तरह स्त्रियाँ भी नेक और बद् हैं । मैंने कामशास्त्र पढ़ा है । मुझे सती और असती स्त्रियोंकी पहचान मालूम है । भिन्ने आपकी भाभीको खूब देख लिया है । वह सौ टक्क का बरा सोना है ।” मेरी बातें सुनकर वह चला गया, कुछ न बोला ;