भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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घरमें सोने-चाँदीके ज़ेवर तो पहलेसे ही थे। अब मैंने दीवालीके त्योहार पर, उसे कोई दो लाखके मोतियोंकी माला, हीरे पत्नेका हार और हीरेका काँटा प्रभृति अमूल्य गहने ला दिये। इतना ही नहीं, अपना सारा रुपया-पैसा उसके हाथमें देकर निश्चिन्त हो गया। आजकल मेरे दिन बढ़े ही आनन्दमें कट रहे थे।

एक दिन मैं अपने मित्रोंके साथ बैठकर हुक्का पी रहा था। बातों-ही-बातोंमें, मेरे सुँहसे अपनी स्त्री की तारीफ़की बातें निकल गईं। मैंने कहा—“भाइयो, मेरी स्त्री स्वर्गकी देवी और बड़ी ही सनी-साध्वी है। आजकल मुझे इस पृथ्वी पर ही स्वर्ग दीख रहा है। मुझे घरद्वार कहीं की किंक नहीं—मैं अपने सारे काम तुम्हारो भोजाईके हाथोंमें सौंप कर बेफिक हूँ।” एक मित्रने मेरी बात काट कर कहा—“शुक्रजी, घरसे एक-दम लापरवाह रहना अकृमन्दी नहीं। थोड़ा बहुत ख्याल रखा करो। शास्त्रमें लिखा है—

वृहस्पतेरपि प्राज्ञो न विश्वासे ब्रजेनरः।

य इच्छेदात्मनो बुद्धिमायुष्यञ्च सुखानि च ॥

जिस बुद्धिमानको अपनी आयु और सुखकी बुद्धिकी इच्छा-हो, उसे देवगुरु वृहस्पतिका भी विश्वास न करना चाहिये।

विश्वास तो किसीका भी न करना चाहिये, जिसमें स्त्रीका विश्वास तो किसी हालतमें भी न करना चाहिये। कहा है—

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