भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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श्रद्धा, भक्ति, प्रेम, स्नेह, पाण्डित्य और विद्वत्ता आदि अपूर्व गुणोंका परिचय पाकर उसका क्रीतदास ही होगा। मुकुपर मनु महाराजके निम्नलिखित श्लोकोंका बड़ा प्रभाव था :—

यत्र नार्थ्यास्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । यत्नेतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्वाङ्गला क्रियाः ॥ जामयो यानि गेहानि शपन्तथप्रतिपूजिताः । तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः ॥ तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनशानैः । भूतिकाभैर्निरित्यं सत्कारे प्रुत्सवेषु च ॥

जिन घरोंमें स्त्रियोंका आदर होता है, उन घरोंपर देवताओं की कृपा रहती है। जहाँ स्त्रियोंका आदर नहीं होता, वहाँ देवताओंके नाराज रहनेसे सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं।

जिस घरमें स्त्रियोंका निरादर होता है, उस घरकी स्त्रियाँ दुःखित होकर शाप दे देती हैं। उनके शाप या बहुदुःखासे वह घर इस तरह नष्ट हो जाता है, मानों किसीने बिप देकर सबको मार डाला हो।

इसलिए, जो पुरुष समृद्धि चाहते हों, उन्हें चाहिये कि नित्यप्रति उत्सव प्रभुत्विके समय गहने, कपड़े और खाने-पीनेके पदार्थोंसे स्त्रियोंकी पूजा करें—उनका सत्कार करें।

मैं अक्षर-मक्षर मनुमहाराजकी आज्ञा पर चलता था।