भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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उस दिन मैं अपनी प्यारी बीबीकी तकरीर सुनकर दिलो-जानसे खुश हो ही गया था ; आजकी तकरीर सुनकर मैं और भी सन्तुष्ट हुआ । बेसाख्ता मेरे मुँहसे “पञ्चतंत्र” का यह श्लोक निकल गया :—

पतिव्रता पतिप्राणा पत्युः प्रियहितेस्ता ।

यस्य स्यादीदृशी भाग्या धन्यः स पुरुषोमुचि ॥

जिसको स्त्री पतिव्रता है, पतिप्राणा है, पतिके प्रिय और हितमें तत्पर है, वह पुरुष पृथ्वी पर धन्य है ।

मैं ऐसी पतिव्रता का मिलना अपने पूर्व जन्मके पुण्योंका फल समझता था । मैं मन-हो-मन कहा करता था कि, यह स्त्री अवश्य ही मेरो पूर्वजन्मकी स्त्री है, तभी तो मुझे इतना चाहती है । कहा हूँ—

सती च योषित प्रकृतिश्च निश्चला

पुमांसमध्येति भवान्तरेण्वपि ॥

सती स्त्री और निश्चल प्रकृति जन्म-जन्मान्तरमें भी पुरुषके साथ रहती है । यही बात ठाक है । निश्चय ही यह मेरी पहले जन्मको भाग्य है ।

यों तो वह जिस दिनसे मेरे घरमें आई थी, उसी दिनसे मैं उस की खूब ख़ातिर करता था । वह जो कहती थी, सोई करता था ; जो माँगती थी, सोई ला देता था । लेकिन अब उस की

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