शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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कन्धेमें पवित्रता, उचारीमें सच, सर्पमें क्षमा, स्त्रीमें कामकी शान्ति, नपुंसकमें धीरज, शराबोमें तत्त्वविचार और राजामें मित्रता—ये बाते न किसीने सुनी-न देखीं।
जो स्त्रीके भीतर है वह उसकी जीभ पर नहीं है, जो जीभ पर है वह बाहर नहीं है। विचित्र चरित्रवाली स्त्रियोंसे भलाई नहीं होती।
स्त्रियाँ स्वभावसे ही चिरमिटिके फलकी तरह भीतरसे ज़हरीली और बाहरसे मनोहर होती हैं।
सोंटिसे मारनेसे, तलवारसे टुकड़े-टुकड़े करनेसे, देनेसे और तारीफ़ करनेसे—किसीसे भी स्त्री वशमें नहीं होती।
मित्रवर ! तुम तो कौन चोज हो, बड़े-बड़े बलवान भी स्त्रियोंके आगे कायर हो जाते हैं। वह चाहते हैं सो करते हैं और माँगती हैं सो देते हैं। महाराजा भर्तृहरि और पिंगला की बात क्या नहीं सुनीं ? कहा है,—
व्याकीर्णकेशरकरालसुखा भुगेन्द्रा
नागाश्रभूरिमदराजिविराजमानाः ।
मेघाविनश्वच पुरुषाः समरेषु शूराः
क्षीसन्निधौ परम कापुरुषा भवन्ति ॥
२३
न किं दद्यान् किं कुर्यात्क्षीभिः प्रत्यर्थितोनरः ।
अनश्वा यत्र हेषन्ते शिरः पर्वणिमुषिडतम ॥