भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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नहीं हो सकती। मैं ऐसे ही विचारोंमें गूँते जा रहा था कि, अन्दरसे मेरी अन्तरात्माने कहा—‘कदाचित तुम्हारा ख्याल ठीक हो, पर परीक्षा कर लेनेमें ही कौनसा हर्ज है ? एक बार परीक्षा कर लेनेसे सदाको वहम मिट जायगा। मैंने खीसे कहा—‘काम ज़रूरी न होता, तो मैं तुम्हें इतनी तकलीफ़ न देता। इस बार मुझे जाने दो, भविष्यमें कहीं न जाऊँगा।’ उसने कहा—‘तुम्हारे बिना मैं रातभर अकेली कैसे रहूँगी ? मुझे घर खानेको दौड़ेगा। अपने एकमात्र आश्रय तुम्हें छोड़कर मैं कैसे जीऊँगी ? तुम्हारे बिना मुझे एक पल प्रलयके समान मालूम होता है।’ यह कहते-कहते वह फिर फूट-फूटकर रोने लगी। उसकी कमलसी आँखोंसे गङ्गा-जमुनाकी सी धारें बहने लगीं। आँसुओंके मारे उसका आँचल और मेरा कुर्ता तर हो गये। मैंने कहा—‘बिना जाये काम न चलेगा, बड़ा नुकसान होगा। अब मेरे दिलको कच्चा न करो। श्यामाकी माँसे कहे जाता हूँ। वह आकर रातको तुम्हारे पास सो रहेगी।’ उसने कहा—‘नहीं, नहीं, मैं आपका नुकसान नहीं चाहती, आपका नुकसान भी तो मेरा ही नुकसान है। लाबारी है। आप चिन्ता छोड़िये। श्यामाकी माँको मैं ही बुला लूँगी। आप भगवान्का नाम लेकर यात्रा कीजिये। देखो, राह-बाटमें सब तरहसे होशियार रहना।’

मैं उसे दम-दिलासा देकर घरसे बाहर निकल गया। उस समय सन्ध्याके पाँच-साढ़े पाँच बजे होंगे। थोड़ासा दिन