शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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और भी बड़ा दूँगा । लोग भी फिर इस तरह की दिल बिगाड़ने-वाली बातें न बनायेँगे । भगवान् रामचन्द्र जानते थे कि, सीता एकदम निर्दोष है, खरा सोना है ; चन्द्रमा कलङ्गी है, पर सीता निष्कलङ्गी है । इतने पर भी, उन्होंने सीताको अग्नि-परीक्षा की । उसका नतीजा अच्छा ही हुआ । सीताका और उनका—दोनोंका ही मुँह संसारके सामने उज्ज्वल हुआ । मैं भी वैसे हो क्यों न कहूँ ?
इस तरह सोच-विचारकर, एक दिन मैंने अपनी लीसे कहा—“आज मुझे बड़ा ज़रूरी काम है । वह काम बिना बाहर जाये हो नहीं सकता ।” वह मेरी बात सुनते ही मेरे गले लगकर ज़ार-ज़ार रोने लगी और कहने लगी—“स्वामिन् ! आपका एक क्षणभरका वियोग भी मैं सहन नहीं कर सकती । आपके बिना मेरा जीवन ख़तरेमें समझिये । आप मुझे छोड़कर कहीं न जाइये ।” उसका उस समयका रोना-कलपना देखकर मेरा दिल कमज़ोर होने लगा । मैं मन-हो-मन कहने लगा—‘हाय ! मैं ऐसी सतीको क्या क्यों दुःख दे रहा हूँ ? लोगोंकी ऊल-जल्लूल बातोंमें आकर, मैं क्यों अपने सुखको मिट्टा कर रहा हूँ ? अच्छल हिमालय चलायमान हो तो हो सकता है, सुमेरु अपने स्थानसे डिगे तो डिग सकता है, सूर्य पूरबकी जगह पच्छिममें उगे तो उग सकता है, समुद्र अपनी मर्यादा उल्लङ्घन करे तो कर सकता है, अग्नि अपनी दाहक शक्ति त्यागे तो त्याग सकता है ; पर मेरी यह प्राणप्यारी-असती या कुलटा