शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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बाकी था। कुछ रात होने तक मैं इधर-उधर फिरता रहा। ज्योंही अन्यकारका पूर्ण राज्य हो गया, हाथको हाथ न सुकने लगा, मैं अपनी बिड़कीके सामने खड़े हुए इमलीके पेड़पर चढ़ गया। ध्यान रहे कि, मेरे घरके चारों तरफ एक चहारदीवारी थी। उस वृक्षसे मेरे घरका क़रीब-क़रीब बहुतसा हिस्सा दिखाई देता था। मैं पेड़ पर बैठता ही था कि, इतनेमें किसीने आकर बिड़कीके किवाड़ खटखटाये और धीरेसे कहा—“क़रुणा! किवाड़ खोल।” आनेवालेकी आवाज़ मेरी जानी हुई स्त्री मालूम हुई। क़रुणा मेरी स्त्रीका नाम था। क़रुणाने आकर दरवाज़ा खोल दिया। तब उस मर्दने कहा—‘मैं थोड़ी देरमें नशे-पत्तेसे टिचन होकर आता हूँ। तुम खाने-पीनेका इन्तज़ाम करो।’
यह कहकर वह आदमी चला गया। क़रुणा बिड़कीके किवाड़ बन्द करके, रसोईकी धुनमें लगी। सड़कपर सामने लाल्टेन जल रही थी। जब वह लाल्टेनके नज़दीक पहुँचा, तब मैंने रोशनीमें उसका चेहरा देखकर पहचान लिया। वह और कोई नहीं; हमारे पाड़ेका चौकीदार था। वह कभी-कभी मेरे घर आया-जाया करता था।
‘खाने पीनेका इन्तज़ाम करो’—इस फ़िक्रको सुनते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गये। शरीर धर-धर धर-धर कांपने लगा। ज़मीन घूमती हुई मालूम होने लगी। आँखोंके सामने अँधेरा छा गया। ऐसा मालूम होने लगा, मानो मैं अभी पेड़से नीचे