भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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मेरी स्त्री सबेरे ही मुझसे बहुत पहले उठती, घर को साफ करती, बर्तन मलती, बीजोंको यथास्थान रखती, समय पर सुन्दर सुखादु भोजन बनाती, मुझे बड़े स्नेहसे परोसकर खिलाती, रातको मेरे पाँव दाबती और जब तक मेरी आँख न लगनी, पाँव दाबती ही रहती। बहुत क्या, वह मुझे हर तरहसे सन्तुष्ट रखती थी। दिन-पर-दिन-उसकी श्रद्धा-भक्ति मुझमें बढ़ती ही जाती थी। इतकिर मुझे भी उस पर मुग्ध होना पड़ा। पति-प्राणा और सती-साध्वी स्त्री पाकर कौन प्रसन्न नहीं होता? कौन अपने भाग्य की सराहना नहीं करता?

यद्यपि स्त्रीके मुँह-सामने स्त्री को तारीफ करना नीति-काराने बुरा कहा है, तोभी जब-कभी उस की सेवासे मेरी अन्तरात्मा बहुत ही प्रसन्न और सन्तुष्ट हो उठती, मैं उसके सामने हो उस की बड़ाई करने लगता। मेरी प्रशंसापूर्ण बातें सुनकर वह सिर नीचा कर लेती और कहती—“पतिदेव! आप मेरे परमेश्वर हैं। मेरा तन-मन-धन सर्वस्व आप पर निष्ठावर है। हमारे भारतमें ही सीता, सावित्री, द्रौपदी, दमयन्ती और गान्धारी प्रभृति अनेकों प्रातस्समरणीय पतिव्रताएँ हो गई हैं, उनके मुकाबलेमें मैं तुच्छ हूँ। मैं आप की क्या सेवा करती हूँ? स्त्रीका धर्म ही पति-सेवा है। गोस्वामी तुलसीदास जीने कहा है:—

एकै धर्म एक व्रत नेमा ।

काय-वचन-मन पतिपदप्रेमा ॥