भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 352, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 352

( ३०३ )

स्त्रीका एक ही धर्म, एक ही व्रत और एक ही नेम है कि, वह काय, वचन और मनसे पतिके वर्णोंमें प्रेम रखे।

“पराशर संहिता”में लिखा है—

दरिद्रं व्याधिरां मूर्खं भर्त्सारं वावमन्यते ।

सा मृता जायते व्याली वैधव्यं च पुनः पुनः ॥

जो स्त्री अपने दरिद्री, रोगी और मूर्ख पति की भी अवज्ञा करती है, वह मरने पर सार्पित होनी और कितने ही जन्मों तक उसे विधवा होना पड़ता है।

“मनुसंहिता”में लिखा है—

वैवाहिको विधिः क्षीणाम्, संस्कारो वैदिकः स्मृतः ।

पतितेवा गुरोवासो गृहार्थोऽविपरिग्निका ॥

स्त्रियोंके लिए विवाह ही उनका वैदिक संस्कार है, पति की सेवा ही उनके लिए गुरु-कुलवास है और घरके धन्ये करना ही अग्निहोत्र है।

और मी :—

भर्त्सा देवो गुरुर्भर्त्सा, धर्मं तीर्थं वतानि च ।

तस्मात्सर्वं परित्यज्य, पतिमेकं समर्चयेत् ॥

स्त्री अपने पति ही को देवता, पतिको ही गुरु, पतिको ही धर्म और पतिको ही व्रत समझे,—सबको छोड़कर केवल एक पतिको ही पूजे।