भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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नहीं हूँ ?' यह बात सुनते ही उसके पतिने आकर देखा, तो ज़मीन पर लून पड़ा पाया और नाक ज्यों-की-न्यों पाई। वह हजार जानसे अपनी स्त्रीकी तारीफ़ करने लगा। उधर वह महात्मा, जो खुपचाप पड़ा हुआ इस अद्भुत लीलाको देख रहा था, मन-ही-मन कहने लगा—

शम्बरस्य च या माया या माया नमुचेरपि ।

बलेः कुम्भीनसंशेव सर्वास्ता योषितो विदुः ॥

शम्बरकी, नमुचिकी, बलि और कुम्भीनस की जितनी माया है, उस सबको स्त्रियाँ जानती हैं।

अनृतं सत्यमित्याहुः सत्यं चापि तथानृतम ।

इति यास्ताः कथं धीरैः संरक्ष्याः पुरुषैरिहः ॥

जो झूठको सब और सबको झूठ कहती हैं, धीर पुरुष, इस संसारमें, उनकी रक्षा कैसे कर सकते हैं ?

नाति प्रसंगः प्रमदासुकायां

नेच्छेद्भले स्त्रीषु विवर्द्धमानम् ।

अति प्रसक्तैः पुरुषैर्मुतास्ताः

क्रीडन्ति काकैरिव लूनपक्षैः ॥

*स्त्रियोंको ज़ियादा मुँह न लगावे और उनका बल न चढ़ने दे, क्योंकि अति आसक्त हुए पुरुषोंसे वह पंक्तुचे हुए कन्धेके समान खेलती हैं।