शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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गणनामें आगया । बहुत क्या—सत्संग की महिमा मेरे दिल पर अच्छी तरह जमी हुई थी, इस लिए मुझे बाल्यावस्थासे ही साधु-महात्माओं की सांगति ज़ियादा पसन्द थी । मेरे गाँवमें कोई भी महात्मा आता, तो मैं उसके आनेका समाचार पाते ही उसके पास ज़रूर पहुँचता ।
एक बार हमारे गाँवके श्मशानमें एक संन्यासी आकर ठहरे । वह जातिके ब्राह्मण, पूर्ण विद्वान्, सच्चे त्यागी और वास्तविक महात्मा थे । उनकी उम्र भी ज़ियादा न थी, कोई वालीस बरसके होंगे । उनका शरीर हृष्ट-पुष्ट और गठौला था । उनके चेहरेसे एक प्रकारका अपूर्व तेज टपका पड़ता था । उनको देखते ही हर मनुष्यके दिलमें उनके प्रति श्रद्धा और भक्तिका भाव उदय होता था । उनकी शोहरत सारे गाँवमें फैल गई—इसलिए सैकड़ों स्त्री-पुरुष उनके दर्शनोके लिए श्मशानमें जाते और उनके दर्शन करके नेत्र सफ़ल करते थे । अधिक क्या कहूँ, मेला सा लगा रहता था । मैं भी नित्य-बिला नागा उनके दर्शनोको जाया करता था । वह हर समय वेदान्त-चर्चा किया करते थे । उनकी तर्कशक्ति, विद्वत्ता और प्रबल युक्तियोंको देखकर लोग दंग रह जाते थे । हरेकके मुँहसे वाह-वाह निकलती थी । पर एक बात उनमें विशेष रूपसे देखनेमें आती थी । वह यह कि, उन्हें स्त्रियोंका—हासकर जवान स्त्रियोंका वहाँ आना पसन्द नहीं था । उनके दंग-डौलसे ऐसा प्रतीत होता था, मानो उन्हें युवतियोंके दर्शन से