भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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घृणा है। वे हमलोगोंको संसारकी असारता और देहकी क्षणभङ्गुरता इस तरह समझाते थे कि, हम सभी श्रोताओंके दिलों पर उनकी बातोंका असर फौरन ही हो जाता था। हमारे दिलोंमें सच्चे वैराग्यका उदय हो आता था। उनके मुँहसे निकली हुई स्त्रियोंकी निन्दा सुनकर तो स्त्रियोंका नाम सुननेसे भी घृणा सी हो जाती थी। वे अपनी बात-चीतके दौरानमें संस्कृतके श्लोक बहुतायतसे कहा करते थे। नीचे लिखा हुआ श्लोक तो वे एक-दो बार नित्य ही कहा करते और शेषमें दर्दभरी आह सी खींचा करते थे। वह श्लोक यह था :--

सुचिन्तितमपि शास्त्रं परिचिन्तनीयम् आराधितोऽपि नृपतिः परिशंकनीयः । क्रोडेस्थितापि युवतीः परिरङ्गायिः शास्त्रे नृपे च युवतौ च कुतो वशीत्वम् ॥

शास्त्रको अच्छी तरह पढ़ लेने पर भी उसका पाठ हमेशा करते रहना चाहिये। राजाको अपने ऊपर मिह्रवान देखकर भी उससे डरते रहना चाहिये। गौदमें बैठो हुई भो जवान स्त्रीकी रक्षा बड़ी होशियारीसे करनी चाहिये। क्योंकि शास्त्र, राजा और जवान स्त्री ये किसीके भी वशीभूत होकर नहीं रहते।

उनके मुखसे यह श्लोक बारम्बार सुननेसे मुझे कुछ शङ्का सी हुआ करती थी। मैं पूछना चाहता था कि महाराजा ! आप युवतियोंकी इतनी निन्दा क्यों किया करते हैं ; पर उनके तेज-

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