शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 338, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( २८६ )
मुख्य है। तूने पत्तिकी आयु बढ़ानेके लिए ऐसा घोर तप किया, जो परपुरुषके साथ आलिङ्गन करनेको तैयार हो गई ! मेरा जैसा भाग्यवान् कौन है ? आ ! मेरे कन्धे पर चढ़ जा ! फिर उस स्त्रीके यारसे कहने लगा—'हे महानुभाव ! आप मेरे पूर्वजन्मके पुण्यसे आये हैं। आपकी कृपासे मेरी आयु बढ़ गई। आपको धन्यवाद है। आप भी मेरे कन्धेपर चढ़िये !' वह यार तो चढ़ना नहीं चाहता था, पर उसने उसे ज्वर्दस्तो चढ़ा लिया और दोनोंको कन्धोंपर लिये हुए नाचता फिरा। साथ ही उन दोनोंका गुणानुवाद भी करता रहा।
देखा बच्चा ! स्त्रीमें कितनी तेज अङ्क है। सरासर कुकम्मे देखकर भी वैश्य शान्त हो गया ; उल्टा अपनी स्त्रीकी बड़ाई करने लगा। यह सब वैश्यकी स्त्रीकी चतुराईका फल था। स्त्रियोंको जितनी जल्दी बात सूझती है, उतनी जल्दी पुरुषोंको नहीं। इसीसे कहा है—
भोजनं द्विगुणं स्त्रीणां, बुद्धिः कृते चतुर्गुणा ।
निश्चयः षड्गुणः पुंभ्यः, कामारचाष्टगुणः स्मृतः ॥
स्त्रीणां द्विगुणाहारो, लज्जा चापि चतुर्गुणा ।
साहसं षड्गुणञ्चैव कामारचाष्टगुणाः स्मृतः ॥
स्त्रियाँ मर्दोंकी अपेक्षा दूना खाती हैं। उनमें मर्दोंसे चौगुनी अङ्क, छः गुना निश्चय और अठगुना काम होता है।
१६