भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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स्त्रियोंमें पुरुषोंकी अपेक्षा दूनी भूष, चौगुनी शर्म, छह गुना साहस और अठगुना काम होता है।

उशना वेद यच्छावंत्रं, यच्च वेद वृहस्पतिः।

की बुद्धया न विशिष्येतु, तस्माद्रुच्याः कथं हि ताः ॥

शुक और बृहस्पति जितने शास्त्रको जानते हैं, उतना स्त्रीका बुद्धिके सामने कुछ भी नहीं है। फिर स्त्रियोंकी रक्षा की जाय तो कैसे की जाय ?

क्यों बच्चा सन्तोष हुआ या और भी सुनना चाहता है ? अच्छा ले, एक बात और भी सुनाता हूँ,—

जाटनी और नायनका त्रिया चरित्र

“किसी नगरमें एक जाट रहता था। उसकी स्त्री कुलटा थी, पर उस बेचारेको यह बात मालूम नहीं थी। हाँ, उसके यार-दोस्त उसकी स्त्रीका हाल जानते थे। वह कहते—‘यार ! स्त्रीकी प्रीति किसी एकसे नहीं होती। स्त्री पर विश्वास करना बड़ी भूल है।’ उसके दिलमें अपने मित्रोंकी बात जम गई। वह उसको फिराकमें रहने लगा। एक दिन उसने एक संन्यासीको अपने घर भोजन कराना चाहा, इसलिये वह उसे अपने घर लिखा लाया। स्त्रीसे कहा—‘तू महाराजकी सेवा कर, मैं बाज़ारसे खीरका सामान ले आता हूँ, क्योंकि महारामजी कहते हैं—