भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २६१ )

अमृतं शिशिरे वहिनमृतं प्रियदर्शनम् ।

अमृतं राजसम्मानमृतं क्षीरभोजनम् ॥

जाड़ुमें आग अमृत है, प्यारेका दर्शन अमृत है, राज-सम्मान अमृत है और खीरका भोजन अमृत है। इसलिये आज खीर ही बनेगी। देख, इधर-उधर मत टरख जाना।' वह तो ऐसा कहकर चल दिया। उसके जाते ही स्त्री गहने-कपड़े पहनकर संन्यासी से बोली—'आप वैडिये, मैं अपने सबीसे मिलकर अभी आती हूँ।' संन्यासीसे ऐसा कहकर वह चल दी। देवयोगसे, राहमें उसका एति उसे मिल गया। उसने देखते ही कहा—'रॉड! मैं लोगोंकी बात कूटी समझता था। पर आज मालूम हुआ, कि उनकी बात सच है। चल, तुझे आज सज़ा दूँगा। ऐसा कहता हुआ, वह उसे अपने घर ले आया। घरमें आकर, उसे खूब मारी-पीटी और कसकर एक खंभेसे बाँध दी। फिर अपने हाथोंने ही पकाकर साधुको खीर खिलाई और अपने भी खूब शराब पीकर खीर खायी। फिर वह नदोमें सो गया।

आधी रात बीतने पर, जाटको सूता समझकर, उसकी एक सखी या दूती-नायन उस स्त्रीके पास आकर कहने लगी—'देख, तेरा यार तेरे बिना मर रहा है! तु क्यों नहीं जाती?' उसने कहा—'देखती नहीं, इस हालतमें कैसे जाऊँ?' नायन ने कहा—'कठिन स्थानमें जाकर जो खादु फल खाते हैं, उन्हींका

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