शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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पतिके चले जानेपर शामको उसने सावुनसे मल-मलकर खूब स्नान किया। नये-नये कपड़े और गहने पहने। कसकर पलंग तैयार किया और दूधके समान सफेद चादर बिछाई। रातको उसका यार आया और पलंगपर बैठ गया। उधर वह वैश्य भी चिराग जलते ही, दूसरे द्वारसे आकर, पलंगके नीचे छिप गया। ज्योंही वह स्त्री पलंग पर चढ़ने लगी कि, उसका पैर खाटके नीचे छिपे हुए उसके पतिसे छू गया। वह फौरन ताड़ गई कि, दुष्ट पति मेरी परीक्षा लेनेके लिए यहीं छिपा है। अब कोई बिया चरित्र करना चाहिये। ज्योंही उसका यार उसे आलिङ्गन करनेको तैयार हुआ, वह बोली—'हे महानुभाव ! आप मेरा शरीर न छूएँ। मैं पतिव्रता और महा सती हूँ। अगर छूओगे तो शाप देकर भस्म कर दूँगी। ये बातें सुनतेही उसका यार बोला—'फिर तूने मुझे बुलाया ही क्यों है ? अगर सती थी तो मुझे न बुलाती।' वह बोली—'सुनो, मैं आज देवीके दर्शन करने गई थी। देवी बोली—'पुत्री ! तू मेरी भक्त है, पर दुःख है कि तू आगामी छह महिनामें विधवा हो जायगी। हाँ, अगर तू आज रातको पर पुरुषको बुलाकर उसे आलिङ्गन करे, तो तेरे पतिको उग्र बढ़ जाय और उस पुरुषकी उग्र घट जाय। बस इसी मनोरथ-सिद्धिके लिए मैंने आपको बुलाया है।' नीचेसे अपनी स्त्रीकी बातें सुनकर वैश्य बोला—'धन्य पतिव्रते धन्य ! कुलका आनन्द वन्दन करनेवाली धन्य ! मैंने दुष्टोंकी बातोंमें आकर तेरी परीक्षा लेनी चाही थी। लेकिन तू तो पतिव्रताओंमें