शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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भी भरोसा नहीं। रुबी चीज़में चिकनाई हो, कठोर वस्तुमें नरमी हो और नीरसमें रस हो, तो स्त्रियोंमें प्रेम हो सकता है।
‘मित्र ! तुम अपनी स्त्रीके झूठे प्रेममें पागल मत बनो। अगर मेरी बातपर विश्वास नहीं है, तो आज उससे विदेश जानेकी बात कहो, पर जाओ कहीं नहीं ; दिनभर मेरे घरमें रहो, रातको अपनी स्त्रीके पल्लगके नीचे घुस जाओ और तमाशा देखो।’
उस वैश्यने अपने मित्रके कहनेके मुताबिक ही अपनी स्त्रीसे विदेश जानेकी बात कही। वह भी सुनते ही प्रसन्न हो गई और उसके लिए पूरी मिठाई प्रभृति बनानेमें लग गई। किसीने कहा है—
दुर्दिवसे धनतिमिरे वर्पतिजलदे महाटवीप्रभृतौ ।
पत्युविदेशगमने परमसुखं जघन चपलायाः ॥
घटाटोप दिन या बुरे दिनोंसे, गहरे अँधेरेसे, मेह बरसनेसे, महावनसे और पतिके प्रदेश जानेसे चपल जाँघोंवाली परपुरुषरता स्त्रियाँ बहुत खुश होती हैं।
बहुत क्या, वैश्य की स्त्रीने पूरी मिठाई बाँधकर पतिको विदा कर दिया। चलते समय कहा—‘आप जल्दी आजाना। मुझे आपके बिना यह मनोहर शय्या कौंटोंसे भरी मालूम होगी। रातभर नींद न आवेगी। खैर, काम है, इसलिए जैसे-तैसे दिन काटूँगी।’