भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २८६ )

चैसा ही कहकर संकल्प छोड़ दिया। संकल्पका जल छोड़ते ही वह मर गई। राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ। राजाने विपसे इस घटनाका रहस्य पूछा। ब्राह्मणने सारा किस्सा ज्योंका त्यों सुना दिया। सुनते ही राजाने खुश होकर वह दोनों गाँव ब्राह्मणको दे दिये और अपने दरबारमें एक उच्च पद भी प्रदान किया।

इसीसे मुझे कहना पड़ता है कि, जिस ब्राह्मणने अपनी स्त्रीके लिये माँ-बाप और भाई-बन्धु छोड़े, अपना आधा जीवन दिया, उसी स्त्रीने उसके साथ ऐसे-ऐसे जाल किये, उसके प्राण-नाशमें भी कोई बात उठा न रखी। अब कहा, स्त्रियोंकी प्रीतिका क्या विश्वास किया जाय ? किसीने ठीक ही कहा है—

एताः स्वार्थपरा नार्थः, केवलं स्वसुखे रताः ।

न तासां बल्लभः कोऽपि, सुतोऽपि स्वसुखं विना ॥

स्वार्थपरायणा स्त्रियाँ केवल अपना सुख ही चाहती हैं। अपने सुखके आगे उन्हें कोई भी प्यारा नहीं—यहाँ तक कि अपने पेटसे पैदा हुआ पुत्र भी प्यारा नहीं।

अच्छा और भी एक कहानी सुन :—

“किसी नगरमें एक वैश्य रहता था। वह अपनी स्त्रीको अत्यधिक प्यार करता था। उसके मित्रोंने कहा—‘भाई ! तुम अपनी स्त्रीका इतना विश्वास मत करो ; स्त्रीकी प्रीतिका ज़रा