भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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उसकी गठड़ी खुलवाई, तो उसमें लैंगड़ा निकला। सिपाही उसे हाकिमके पास ले गये। हाकिम ने पूछा—'यह क्या मामिला है ?' तू ने मर्दको गठरीमें क्यों बाँध रखा है ?'

ब्राह्मणीने जवाब दिया—'यह मेरा पति है। यह चल नहीं सकता, इसलिये मैं इसे गठरीमें धरकर घूमती हूँ। महाराज ! पतिव्रताका यही धर्म है।' हाकिम उसकी बातसे खुश होकर उसे राजाके पास ले गया। राजा उसका पतिन्हे देखकर बहुत ही प्रसन्न हुआ और उसे आनन्दसे जीवन बितानेके लिए दो गाँव इनाममें दिये।

कुछ रोज बाद वह ब्राह्मण भी किसी तरह क्रूर से निकलकर उसी नगरमें आया। उस स्त्रीने उसे देखते ही राजासे प्रार्थना की, कि महाराज ! यह आदमी मेरे पतिका शत्रु है। राजाने सुनते ही, बिना विचार किये, ब्राह्मणको शूली पर चढ़ाने की आज्ञा दे दी। तब ब्राह्मणने राजासे कहा—' आप धर्मात्मा राजा है, आपने मुझे दण्ड दिया, सो तो मैं भोगूंगा ही, पर इसके पास मेरी कुछ संकान्त वस्तु है, वह मुझें दिला दीजिये। इसके बाद मुझें फाँसी पर चढ़वाइये।' राजाने कहा—'हे पतिव्रते ! तूने इसकी कुछ संकान्त वस्तु ली है ?' ब्राह्मणीने कहा—'मैंने तो इससे कुछ भी नहीं लिया है।' ब्राह्मण बोला—'तू हाथमें पानी लेकर तीन बार यह कह दे, कि इसने मुझे जो कुछ भी दिया हो, वह मैं वापस देती हूँ।' स्त्री राजाके भयसे इस बात पर राजी हो गई और तीन बार