शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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हो। मेरी आत्मा तुमसे सन्तुष्ट है। अबसे मैं तुम्हारी हो चुकी। मैंने तुम्हें आत्मसमर्पण किया। अब तुम भी हमारे साथ चले चलो।' लँगड़े ने कहा—'मैं न तो चल सकता हूँ और न कमा सकता हूँ, इसलिये मुझे ले चलनेसे तुम्हें कष्ट होगा।' स्त्री ने कहा—'तुम चुप रहो, मैं सब इन्तज़ाम कर लूँगी।'
इन दोनोंमें ये बातें हो ही रही थीं कि, ब्राह्मण शहरसे आटा, दाल, घी और लकड़ी लेकर आ गया। भोजन बनाकर खानेकी तैयारी करने लगा, तब ब्राह्मणी बोली—'हे खामिन! यह लँगड़ा भी भूखा है। इसे बिना खिलाये खाना उचित नहीं। इसलिये इसे भी परोस दीजिये।' भोले ब्राह्मणने आप खाया, स्त्री और उस लँगड़ेको भी खिलाया। खा-पीकर जब वे आगे चलने लगे, तब स्त्री बोली—'हे पतिदेव! आप और मैं दो ही जने हैं, आप कहीं चले जाओगे तो अकेलेमें मेरा मन न लगेगा। इसलिये इस लँगड़ेको आप कन्धे पर रखकर ले चले', तो मुझे बातचीत का सहारा हो जायगा।' ब्राह्मण बोला—'प्यारी! मुझे अपना शरीर ही भारी हो रहा है, मैं इसे न ले चल सकूँगा।' तब स्त्रीने स्वयं उसे गाँठमें बाँधकर अपने सिर पर धर लिया। ब्राह्मण ने उसकी बातोंमें आकर ई कार नहीं किया। कुछ दिनों बाद वे एक और गाँवके निकट पहुँचे। ब्राह्मण कूप से पानी भरने लगा। उसकी स्त्रीने उसे कूपमें धकेल दिया और अपनी गठड़ी को लेकर आगे चल दी। पुलिसने चोरीका माल समझ कर