शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २८२ )
चन्द ऐसी कहानियाँ सुनाता हूँ, जिनसे तुम्हें मेरी बातोंकी सत्यतामें अणुमात्र भी सन्देह न रहेगा। ध्यान देकर सुन—
“किसी शहड़में एक विद्वान, रूपवान और रतिशास्त्रपारङ्गत ब्राह्मण रहता था। वह अपनी स्त्रीको प्राणसे भी अधिक प्यार करता था; लेकिन उसकी स्त्री कलहकारिणी थी। वह अपनी सास-ननद और दिव्रानी-जिठानियोंसे रोज़ तकरार किया करती थी; इसलिये वह ब्राह्मण नित्यके क्लेशसे दुःखी होकर, अपनी प्यारी स्त्रीको लेकर, किसी दूसरे नगरको चल दिया। चलते-चलते वे दोनों एक घोर बनमें पहुँचे। ब्राह्मण की स्त्रीको बड़े जोरसे प्यास लगी। उसने अपने पतिसे कहा—‘मुझे प्यास बहुत जोरसे लगी है, आप कहीं से जल लावे’ तो मेरी जान बचे।’ ब्राह्मण लोटा डोर लेकर पानीकी खोजमें गया। बड़ी खोजसे उसे एक कुआ मिल। वह पानी भर कर वापस लौटा। लेकिन आकर क्या देखता है कि, उसकी प्राणप्यारी मरी हुई पड़ी है और पास ही एक काल भुजङ्ग बैठा है। ब्राह्मणको देखते ही साँप जड़ल्लमें भाग गया। ब्राह्मणने समझ लिया कि, मेरी स्त्री को सर्पने डसा है।
उसने बहुत देर तक तो विलाप किया; फिर जड़ल्लसे लकड़ी लाकर चिता बनाई और उस चितामें स्त्री सहित जल्लनेकी तैयारी की। इतनेमें आकाशवाणी हुई—‘हे विप्र! अगर तू अपनी आयु मेंसे आधी आयु इसे दे दे, तो यह जी सकती है।’ यह वाणी सुनते ही ब्राह्मणने स्नान-ध्यानसे पवित्र हो, तीन बार