भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 323

( २७४ )

जल्पन्ति सार्द्धमन्येन पश्यन्त्यन्यं सविश्रमाः ।

हृदये चिन्तयन्त्यन्यं भियः को नाम योषिताम् ॥१२॥

स्त्रियाँ बात तो किसीसे करती हैं, देखतीं किसी औरको हैं, और दिलमें चाहतीं किसी और को हैं । विलासवती स्त्रियोंका प्यारा कौन है ? ॥१२॥

खुलासा—वास्तवमें, स्त्रियोंका प्यारा कोई भी नहीं । जो एक ही समयमें बात एकसे करती हैं, देखतीं दूसरेको और दिलमें चाहतीं तीसरेको हैं, उनका प्रेम किससे हो सकता है ?

स्त्री स्वभावसे ही चञ्चल है । इसका चित्त एक जगह स्थिर नहीं रहता । इसके मनमें कुछ, बातोंमें कुछ और आँखोंमें कुछ । इसके चित्तका पता नहीं । यह सदा किसी एकसे मुहव्यत नहीं रखती । बेईमानी, धोखेबाज़ी, छल, कपट, भूट और बेवफ़ाई तो परमात्माने इसे खूब ही दी है । महाकवि दगने खूब कहा है—

तुमसे बचकर इक वफ़ा, हिस्सेमें अपनी लग गई ।

तुमने खूबी कौनसी, छोड़ी ज़मानेके लिये ॥

सब है, सभी अच्छी चीज़ें तुम्हारे हिस्सेमें आ गईं । एक वफ़ा ज़रूर तुमसे बचकर मेरे हिस्सेमें आ गई है । इस खूबीको छोड़ कर और सब खूबियाँ तुम्हारे पास मौजूद हैं ।

स्त्री बाहरसे जैसी मनोहर दीखती है, भीतरसे वैसी नहीं होती । उसका शरीर मनोहर होता है, पर हृदय वज्रवत् कठोर