शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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होता है। वह अपने चन्द्रमुखसे मधु-जैसी मीठी-मीठी बातें करती है और तीक्ष्ण वित्तसे चोट मारती है। इसीलिये कहते हैं कि, उसकी जीभमें मधु और हृदयमें हालाहल विष रहता है। पर जिन्होंने संसार नहीं देखा है, जिन्हें इस जगत्की टेढ़ी-सीधी बातें नहीं मालूम, वे नातजुर्वंकार नौजवान, इन बातोंको न समझ कर, इन कुटिला कामिनियोंका पूर्ण विश्वास कर बैठते हैं। इनके यह कहने पर, कि आप ही हमारे सूरज, आप ही हमारे चाँद और आप ही हमारे परमेश्वर हो, आप ही से हमें जगत्में उजियाला है; नवयुवक पागलसे हो जाते हैं और इन्हें सती सीता और सावित्री समझ कर इनके कीतदास हो जाते हैं। जब कामी पुरुष सोलह आने इनके क्राबूमें हो जाते हैं, तब वे निरंकुश होकर अपनी माया रचने लगती हैं। एकको आँखोंके इशारोंसे, दूसरेको बातोंसे, तीसरेको चेष्टाओंसे प्रसन्न करतीं और चौथे—अपने पति—को अपनी मायामें पागल बनाये रखती हैं। उसे सूक्ष्मता होने पर भी अन्या कर देती हैं। उसके मौजूद रहते कुकर्म करती हैं; पर उस भौँदूको कुछ नहीं सूक्ष्मता। बुद्धिमानोंको इनके सतीत्व पर हरगिज़ विश्वास न करना चाहिये; क्योंकि किसी एक की होना तो विधाता इनके भालमें लिखा ही नहीं। किसीने ठीक ही कहा है:—
यदि स्यात्पावकः शीतः, प्रोप्नो वा शशलाश्वनः क्षीणां तदा सतीत्वं स्याद्, यदि स्याद् दुर्जनोहितः ॥