शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 325, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( २७६ )
अगर आग शीतल हो जाय, चन्द्रमा गरम हो जाय और डुर्जन हितकारी हो जायें, तभी खियोंके सतीत्वका विश्वास किया जा सकता है।
और भी कहा है—
यो मोहान्मन्यते मूढो रक्तेयं कामिनी ।
स तस्या वशगो नित्यं भवेत् कीडाशकुन्तवत् ॥
जो मूढ़ मनुष्य यह समझता है कि, यह स्त्री मुझे प्यार करती है, वह उसके वश होकर खेलके पक्षीकी तरह हो जाता है। पर वास्तवमें, वह उसे नहीं चाहती। उसको न कोई प्यारा है और न कुप्यारा। जिस पर तबियत आजाय, वह उसी की है; पर उसकी भी सदा-सर्वदा नहीं। चञ्चल नारी-जातिका चित्त कभी भी स्थिर हो सकता है ?
दोहा ।
मनमें कछु बातन कछु, नैननमें कछु और ।
चित्तकी गति कछु और ही, यह प्यारी किहि ठौर ॥८१॥
सार—स्त्री बेवफा है। उसकी मुहब्बत सर्वदा किसीके साथ रह ही नहीं सकती। जिसकी स्त्री वफादार और सती हो, वह निस्सन्देह पूर्ण पुण्यत्मा है।