शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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रूपजला चलनयना नाभ्यावर्तांकचावलि भुजंगा ।
मज्जनन्तियत्र सन्तः सेयं तहूषी तर्हगिष्यी विषमा ॥
रूप ही जल है, चंचल नयन मछलियाँ हैं, नामि भँवर है और सिरके बाल सर्प हैं—यह तरुण स्त्री रूपी नदी दुस्तर नदी है । इस नदीमें शृं गारशास्त्र-प्रवीण सज्जन ज्ञान करते हैं ।
महाकवि कालिदासके एक रूपकका भी रस आखादन कीजिये । उसमें कुछ और ही मज़ा है :—
वाहू द्वौ च मृणालमास्यकमलं, लावण्यलीलाजलं,
श्रोषी तीर्थशिला च नेत्रशफरी, धर्मिमल शैवालकम् ।
कान्तायाः स्तन चक्रवाक युगलं, कन्दर्पवाणानलैर्दग्ध-
नामवगाहनाय, विधिना रम्यं सरो निर्मितम् ॥
ब्रह्माने कामदेवके वाणोंकी अग्नि-ज्वालासे जलते हुए पुरुषों के ज्ञान करनेके लिये स्त्री रूपी सुन्दर तालाब बनाया है । इस तालाबमें क्या-क्या चीज़ें हैं ? इस तालाबमें स्त्रीकी दोनों भुजायें तो कमलकी डंडी हैं, उसका मुँह कमल है, उसके लावण्यका विलास जल है, कमर उतरनेकी सीढ़ी है, उसके नेत्र मछलियाँ हैं, उसके बँधे हुए केश—बाल सिवार हैं और दोनों स्तन चक्रवाकके जोड़े हैं ।
इसमें कोई शक नहीं, कि कन्दर्प-तापको स्त्रीके पयोधर—कुच ही शान्त करते हैं । शरीरमें कामवाणोंकी ज्वाला उठने पर, स्त्री ही उस ज्वाला को शान्त करती है ; पर बीमार होकर