शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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कान्ताकारधरा नदीयमभितः कूराशयानेज्यते
संभाराएविमञ्जनंयदितोद्रेणसंलज्यताम् ॥८०॥
खुलासा—स्त्री एक नदी है। उसके पेट पर जो त्रिवर्लीके समान तीन रेखासी हैं, वही उस नदीकी लहर हैं, उसके दोनों कठोर कुच चकवेके जोड़े हैं और उसके जो कूर अभिप्राय हैं, वही भँवर हैं—जिस तरह और नदियाँ समुद्रमें जाकर गिरती हैं; उसी तरह स्त्री-नदी भी संसार-सागरमें जाकर गिरती है। जिस तरह और नदियोंमें गिरी हुई चीज़ नदीके प्रवाहके साथ चलती हुई समुद्रमें जा पड़ती है; उसी तरह स्त्री-नदीमें गिरी हुई वस्तु भी संसार-सागरमें जा पड़ती है। जो पुरुष इस स्त्री-नदीमें स्नान या क्रीड़ा प्रभृति करते हैं, वे उसके तेज बहावमें चलते-हुए संसार-सागरमें जा पड़ते हैं। समुद्रमें गिरे बाद बचना कठिन हो जाता है, इसलिये जो पुरुष संसार-सागरमें दूबनेसे बचना चाहें, वे स्त्री-नदीसे दूर रहें। इस भयङ्कर नदीके पास भी न जायँ। इस स्त्री-नदीका जोर साधारण नदियोंकी अपेक्षा बहुत अधिक है। और नदियोंमें तो वही डूबता है, जो उनके अन्दर घुसता या पैर देता है; पर स्त्री-नदी तो सामने आये हुए पुरुषको अपने बलसे, अजगरकी तरह, भीतर खींच लेती और फिर उसे संसार-सागरमें लेजा पटकती है। “भामिनी विलास”-कस्तु पण्डितवर जगन्नाथ महाराजने और ही तरह रूपक वाँचा है। उसका आशय कुछ और है, फिर भी उसका रसा-स्वादन कीजिये :-