भारतकोश
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शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

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( २७३ )

दवा खाने और आरोग्य होनेकी अपेक्षा बीमार न होना कहीं अच्छा है ।

क्षपय ।

लिवली तरल तरंग, लसत कुच चक्रवाक-सम ।

प्रकुलित आनन कञ्च, नारि यह नदी मनोरम ।

महा भयानक चाल, चलत भवसागर-सन्मुख ।

हाथ धरत ही ऐंच लेत, जितको अपने रख ।

संसार-सिन्धु चाहत तर्बो, तौ तू यासौ दूर रह ।

जाको प्रवाह अतिही प्रवल, नैक न्हात ही जात वह ॥८०॥

सार—स्त्री-रूपी दुस्तर नदी से सदा दूर रहो, क्योंकि इसके सामने जानेवाले की भी खैर नहीं ।

80. A woman who is compared to a river, having the beautiful linings on the stomach like waves (of the river), having developed breasts like the pair of Chakrabak and the face shining like the lotus, but whose intention is very crooked should be shunned carefully if one does not wish to be drowned in it. (A river may appear very pleasing in sight but anything falling in it is taken to the deep ocean, so also the woman may appear attractive but any one indulging in her is ruined.)

—*—

१८

( २७४ )

जल्पन्ति सार्द्धमन्येन पश्यन्त्यन्यं सविश्रमाः ।

हृदये चिन्तयन्त्यन्यं भियः को नाम योषिताम् ॥१२॥

स्त्रियाँ बात तो किसीसे करती हैं, देखतीं किसी औरको हैं, और दिलमें चाहतीं किसी और को हैं । विलासवती स्त्रियोंका प्यारा कौन है ? ॥१२॥

खुलासा—वास्तवमें, स्त्रियोंका प्यारा कोई भी नहीं । जो एक ही समयमें बात एकसे करती हैं, देखतीं दूसरेको और दिलमें चाहतीं तीसरेको हैं, उनका प्रेम किससे हो सकता है ?

स्त्री स्वभावसे ही चञ्चल है । इसका चित्त एक जगह स्थिर नहीं रहता । इसके मनमें कुछ, बातोंमें कुछ और आँखोंमें कुछ । इसके चित्तका पता नहीं । यह सदा किसी एकसे मुहव्यत नहीं रखती । बेईमानी, धोखेबाज़ी, छल, कपट, भूट और बेवफ़ाई तो परमात्माने इसे खूब ही दी है । महाकवि दगने खूब कहा है—

तुमसे बचकर इक वफ़ा, हिस्सेमें अपनी लग गई ।

तुमने खूबी कौनसी, छोड़ी ज़मानेके लिये ॥

सब है, सभी अच्छी चीज़ें तुम्हारे हिस्सेमें आ गईं । एक वफ़ा ज़रूर तुमसे बचकर मेरे हिस्सेमें आ गई है । इस खूबीको छोड़ कर और सब खूबियाँ तुम्हारे पास मौजूद हैं ।

स्त्री बाहरसे जैसी मनोहर दीखती है, भीतरसे वैसी नहीं होती । उसका शरीर मनोहर होता है, पर हृदय वज्रवत् कठोर

( २७५ )

होता है। वह अपने चन्द्रमुखसे मधु-जैसी मीठी-मीठी बातें करती है और तीक्ष्ण वित्तसे चोट मारती है। इसीलिये कहते हैं कि, उसकी जीभमें मधु और हृदयमें हालाहल विष रहता है। पर जिन्होंने संसार नहीं देखा है, जिन्हें इस जगत्की टेढ़ी-सीधी बातें नहीं मालूम, वे नातजुर्वंकार नौजवान, इन बातोंको न समझ कर, इन कुटिला कामिनियोंका पूर्ण विश्वास कर बैठते हैं। इनके यह कहने पर, कि आप ही हमारे सूरज, आप ही हमारे चाँद और आप ही हमारे परमेश्वर हो, आप ही से हमें जगत्में उजियाला है; नवयुवक पागलसे हो जाते हैं और इन्हें सती सीता और सावित्री समझ कर इनके कीतदास हो जाते हैं। जब कामी पुरुष सोलह आने इनके क्राबूमें हो जाते हैं, तब वे निरंकुश होकर अपनी माया रचने लगती हैं। एकको आँखोंके इशारोंसे, दूसरेको बातोंसे, तीसरेको चेष्टाओंसे प्रसन्न करतीं और चौथे—अपने पति—को अपनी मायामें पागल बनाये रखती हैं। उसे सूक्ष्मता होने पर भी अन्या कर देती हैं। उसके मौजूद रहते कुकर्म करती हैं; पर उस भौँदूको कुछ नहीं सूक्ष्मता। बुद्धिमानोंको इनके सतीत्व पर हरगिज़ विश्वास न करना चाहिये; क्योंकि किसी एक की होना तो विधाता इनके भालमें लिखा ही नहीं। किसीने ठीक ही कहा है:—

यदि स्यात्पावकः शीतः, प्रोप्नो वा शशलाश्वनः क्षीणां तदा सतीत्वं स्याद्, यदि स्याद् दुर्जनोहितः ॥

( २७६ )

अगर आग शीतल हो जाय, चन्द्रमा गरम हो जाय और डुर्जन हितकारी हो जायें, तभी खियोंके सतीत्वका विश्वास किया जा सकता है।

और भी कहा है—

यो मोहान्मन्यते मूढो रक्तेयं कामिनी ।

स तस्या वशगो नित्यं भवेत् कीडाशकुन्तवत् ॥

जो मूढ़ मनुष्य यह समझता है कि, यह स्त्री मुझे प्यार करती है, वह उसके वश होकर खेलके पक्षीकी तरह हो जाता है। पर वास्तवमें, वह उसे नहीं चाहती। उसको न कोई प्यारा है और न कुप्यारा। जिस पर तबियत आजाय, वह उसी की है; पर उसकी भी सदा-सर्वदा नहीं। चञ्चल नारी-जातिका चित्त कभी भी स्थिर हो सकता है ?

दोहा ।

मनमें कछु बातन कछु, नैननमें कछु और ।

चित्तकी गति कछु और ही, यह प्यारी किहि ठौर ॥८१॥

सार—स्त्री बेवफा है। उसकी मुहब्बत सर्वदा किसीके साथ रह ही नहीं सकती। जिसकी स्त्री वफादार और सती हो, वह निस्सन्देह पूर्ण पुण्यत्मा है।

चित्र: आक्रमण का दृश्य — गँडासे के प्रहार का नाटकीय अंकन।

( २० ) उसने अपने सामने रखा हुआ गँडासा मेरी पीठ पर मारा ।

( २७८ )

सत्संगः केशवे भक्तिगीताम्भसि नियमज्जनम् ।

असारे खलु संसारे कीर्ति साराणि भावयेत् ॥

सत्पुरुषोंका संग, कृष्ण की भक्ति और गङ्गाजलका स्नान— इस असार संसारमें ये तीन ही सार समझे जाते हैं ।

एक घरी आधी घरी, आधी सोभी आध ।

कबिरा संगति साधुकी, कटै कोटि अपराध ॥

कबिरा संगति साधुकी, नितप्रति कीजै जाय ।

दुर्मति दूर बहावसी, देसी सुमति बताय ॥

एक घड़ी, आधी घड़ी और पाव घड़ी-जितना भी समय मिले, सत्पुरुषों की संगति अवश्य करनी चाहिये, क्योंकि उनकी संगतिसे करोड़ों अपराध नष्ट हो जाते हैं ।

साधु पुरुषों की संगति नित्य ही करनी चाहिये, क्योंकि उससे कुमति दूर होती और सुमति आती है ।

इस संसार रूपी कड़वे वृक्षके दो ही फल हैं :—( १ ) मीठा बोलना, और ( २ ) सज्जनों का संग । लेखनीमें सामर्थ्य नहीं, जो सत्संग की महिमा बखान सके । यद्यपि लोहा पानीमें जाकर साफ नहीं होता, उस पर उल्टी जंग बढ़ जाती है ; तोभी पारसके साथ मिलनेसे वह सोना हो जाता है । उसी तरह सत्संगसे नीच भी महापुरुष हो जाता है । सप्त ऋषियों की संगतिसे नित्य प्रति हत्या करने वाला व्याधा महामुनियों की

( २७६ )

गणनामें आगया । बहुत क्या—सत्संग की महिमा मेरे दिल पर अच्छी तरह जमी हुई थी, इस लिए मुझे बाल्यावस्थासे ही साधु-महात्माओं की सांगति ज़ियादा पसन्द थी । मेरे गाँवमें कोई भी महात्मा आता, तो मैं उसके आनेका समाचार पाते ही उसके पास ज़रूर पहुँचता ।

एक बार हमारे गाँवके श्मशानमें एक संन्यासी आकर ठहरे । वह जातिके ब्राह्मण, पूर्ण विद्वान्, सच्चे त्यागी और वास्तविक महात्मा थे । उनकी उम्र भी ज़ियादा न थी, कोई वालीस बरसके होंगे । उनका शरीर हृष्ट-पुष्ट और गठौला था । उनके चेहरेसे एक प्रकारका अपूर्व तेज टपका पड़ता था । उनको देखते ही हर मनुष्यके दिलमें उनके प्रति श्रद्धा और भक्तिका भाव उदय होता था । उनकी शोहरत सारे गाँवमें फैल गई—इसलिए सैकड़ों स्त्री-पुरुष उनके दर्शनोके लिए श्मशानमें जाते और उनके दर्शन करके नेत्र सफ़ल करते थे । अधिक क्या कहूँ, मेला सा लगा रहता था । मैं भी नित्य-बिला नागा उनके दर्शनोको जाया करता था । वह हर समय वेदान्त-चर्चा किया करते थे । उनकी तर्कशक्ति, विद्वत्ता और प्रबल युक्तियोंको देखकर लोग दंग रह जाते थे । हरेकके मुँहसे वाह-वाह निकलती थी । पर एक बात उनमें विशेष रूपसे देखनेमें आती थी । वह यह कि, उन्हें स्त्रियोंका—हासकर जवान स्त्रियोंका वहाँ आना पसन्द नहीं था । उनके दंग-डौलसे ऐसा प्रतीत होता था, मानो उन्हें युवतियोंके दर्शन से

( २८० )

घृणा है। वे हमलोगोंको संसारकी असारता और देहकी क्षणभङ्गुरता इस तरह समझाते थे कि, हम सभी श्रोताओंके दिलों पर उनकी बातोंका असर फौरन ही हो जाता था। हमारे दिलोंमें सच्चे वैराग्यका उदय हो आता था। उनके मुँहसे निकली हुई स्त्रियोंकी निन्दा सुनकर तो स्त्रियोंका नाम सुननेसे भी घृणा सी हो जाती थी। वे अपनी बात-चीतके दौरानमें संस्कृतके श्लोक बहुतायतसे कहा करते थे। नीचे लिखा हुआ श्लोक तो वे एक-दो बार नित्य ही कहा करते और शेषमें दर्दभरी आह सी खींचा करते थे। वह श्लोक यह था :--

सुचिन्तितमपि शास्त्रं परिचिन्तनीयम् आराधितोऽपि नृपतिः परिशंकनीयः । क्रोडेस्थितापि युवतीः परिरङ्गायिः शास्त्रे नृपे च युवतौ च कुतो वशीत्वम् ॥

शास्त्रको अच्छी तरह पढ़ लेने पर भी उसका पाठ हमेशा करते रहना चाहिये। राजाको अपने ऊपर मिह्रवान देखकर भी उससे डरते रहना चाहिये। गौदमें बैठो हुई भो जवान स्त्रीकी रक्षा बड़ी होशियारीसे करनी चाहिये। क्योंकि शास्त्र, राजा और जवान स्त्री ये किसीके भी वशीभूत होकर नहीं रहते।

उनके मुखसे यह श्लोक बारम्बार सुननेसे मुझे कुछ शङ्का सी हुआ करती थी। मैं पूछना चाहता था कि महाराजा ! आप युवतियोंकी इतनी निन्दा क्यों किया करते हैं ; पर उनके तेज-

( २८१ )

प्रताप या रौवसे पुल्लेकी हिम्मत न कर सका । एकवार हिम्मत वाँधकर मैं कह ही तो उठा—“भगवान् ! स्त्रियाँ न हों, तो ईश्वरकी सृष्टि ही लोप हो जाय, यह संसार सूना हो जाय; यहाँ कुछ भी दिखाई ही न दे । पुरुष और प्रकृतिसे ही यह सृष्टि है । अकेला पुरुष सृष्टि-रचना नहीं कर सकता । जगत्की रचनामें प्रकृति की सहायता की परमावश्यकता है । भगवान् रामचन्द्र, भगवान् श्रीकृष्ण, महाराजा हरिश्चन्द्र, महाराज भरत और प्रह्लाद प्रभृति खीसे ही पैदा हुए हैं । किसीने कहा है—

नारी-निन्दा मत करो, नारी नरकी खान ।

नारीसे नर ऊपजे, धू-पह्लाद-समान ॥

नारी-जातिकी निन्दा मत करो, क्योंकि नारी ही नरोंकी खान है । नारीसे ही ध्रुव और प्रह्लाद जैसे महापुरुषोंने जन्म लिया है ।

मेरी बात सुनकर वे कहने लगे—“भैया ! तुम्हारी बात सच है । निस्सन्देह, स्त्री-विना ईश्वरकी सृष्टि नहीं चल सकती । खी से ही जगत्की उत्पत्ति है । इस विषयमें मेरा मत-भेद नहीं । मेरा तो कहना है कि, स्त्रियोंकी प्रीति निश्चल नहीं होती । उनका दिल बड़ा चञ्चल होता है । क्षण-भरमें वे पराई हो जाती हैं । जिस तरह गाय नयी-नयी घास चरना चाहती है ; उसी तरह स्त्रियाँ नित-नये पुरुषोंको भोगना चाहती हैं । बलवान् पुरुषोंसे भी उनकी कामाग्नि शान्त नहीं होती । अब मैं तुम्हें

( २८२ )

चन्द ऐसी कहानियाँ सुनाता हूँ, जिनसे तुम्हें मेरी बातोंकी सत्यतामें अणुमात्र भी सन्देह न रहेगा। ध्यान देकर सुन—

“किसी शहड़में एक विद्वान, रूपवान और रतिशास्त्रपारङ्गत ब्राह्मण रहता था। वह अपनी स्त्रीको प्राणसे भी अधिक प्यार करता था; लेकिन उसकी स्त्री कलहकारिणी थी। वह अपनी सास-ननद और दिव्रानी-जिठानियोंसे रोज़ तकरार किया करती थी; इसलिये वह ब्राह्मण नित्यके क्लेशसे दुःखी होकर, अपनी प्यारी स्त्रीको लेकर, किसी दूसरे नगरको चल दिया। चलते-चलते वे दोनों एक घोर बनमें पहुँचे। ब्राह्मण की स्त्रीको बड़े जोरसे प्यास लगी। उसने अपने पतिसे कहा—‘मुझे प्यास बहुत जोरसे लगी है, आप कहीं से जल लावे’ तो मेरी जान बचे।’ ब्राह्मण लोटा डोर लेकर पानीकी खोजमें गया। बड़ी खोजसे उसे एक कुआ मिल। वह पानी भर कर वापस लौटा। लेकिन आकर क्या देखता है कि, उसकी प्राणप्यारी मरी हुई पड़ी है और पास ही एक काल भुजङ्ग बैठा है। ब्राह्मणको देखते ही साँप जड़ल्लमें भाग गया। ब्राह्मणने समझ लिया कि, मेरी स्त्री को सर्पने डसा है।

उसने बहुत देर तक तो विलाप किया; फिर जड़ल्लसे लकड़ी लाकर चिता बनाई और उस चितामें स्त्री सहित जल्लनेकी तैयारी की। इतनेमें आकाशवाणी हुई—‘हे विप्र! अगर तू अपनी आयु मेंसे आधी आयु इसे दे दे, तो यह जी सकती है।’ यह वाणी सुनते ही ब्राह्मणने स्नान-ध्यानसे पवित्र हो, तीन बार

( २८३ )

संकल्पका मंत्र कहकर, अपनी स्त्रीको आधी उग्र दे दी। ब्राह्मणी तत्काल जी उठी। ब्राह्मणने उससे यह बात न कही। जड़ूलसे फल-मूल लाकर उसे खिलाये और आप खाये। फिर वहाँसे दोनों चल दिये।

चन्दु रोज बाद वे दोनों स्त्री-पुरुष एक बड़े नगरमें पहुँचे। नगरके बाहर एक मनोहर बाग था। ब्राह्मण वहाँ ठहर गया। स्नान-पूजासे निपटकर उसने ब्राह्मणीसे कहा—'मैं शहरमें जाकर खाने-पीनेका सामान ले आता हूँ, तुम यहीं बैठ रही हो, आकर भोजन बनाऊँगा और फिर दोनों खायेंगे।' यह कहकर ब्राह्मण तो शहरमें चला गया और ब्राह्मणी अकेली बैठ रही। उस बागके कूप की सीढ़ियों पर एक लँगड़ा आदमी बैठा हुआ मनोहर खरसे गीत गा रहा था। उसके गानेसे स्त्रीका काम जाग उठा। वह काम-पीड़ित हो, लँगड़ेके पास जाकर बोली—'हे भद्र पुरुष! तू मेरे साथ भोग कर। अगर तू मेरी कामशान्ति न करेगा, तो तुम्हें मुझ अबलाकी हत्या लगेगी। स्त्री-हत्या बहुत बड़ा पाप है।' लँगड़ा बोला! 'हे कल्याण! मैं रोगी हूँ, अद्भुत हूँ, मुझसे तेरी शान्ति न होगी।' स्त्री बोली—'मैं तेरी एक बात नहीं सुनूँगी। अगर तू मेरा कहना न मानेगा, तो मैं अभी हत्या करके तुम्हें राजाके सिपाहियोंसे पकड़वा दूँगी।' अखिरकार वह लँगड़ा भयसे या और किसी वजहसे उसकी बात पर राजी हो गया। उसने उससे संगम किया। संगम हो चुकने पर वह बोली—'हे भद्र! तुम बड़े अच्छे पुरुष

( २८४ )

हो। मेरी आत्मा तुमसे सन्तुष्ट है। अबसे मैं तुम्हारी हो चुकी। मैंने तुम्हें आत्मसमर्पण किया। अब तुम भी हमारे साथ चले चलो।' लँगड़े ने कहा—'मैं न तो चल सकता हूँ और न कमा सकता हूँ, इसलिये मुझे ले चलनेसे तुम्हें कष्ट होगा।' स्त्री ने कहा—'तुम चुप रहो, मैं सब इन्तज़ाम कर लूँगी।'

इन दोनोंमें ये बातें हो ही रही थीं कि, ब्राह्मण शहरसे आटा, दाल, घी और लकड़ी लेकर आ गया। भोजन बनाकर खानेकी तैयारी करने लगा, तब ब्राह्मणी बोली—'हे खामिन! यह लँगड़ा भी भूखा है। इसे बिना खिलाये खाना उचित नहीं। इसलिये इसे भी परोस दीजिये।' भोले ब्राह्मणने आप खाया, स्त्री और उस लँगड़ेको भी खिलाया। खा-पीकर जब वे आगे चलने लगे, तब स्त्री बोली—'हे पतिदेव! आप और मैं दो ही जने हैं, आप कहीं चले जाओगे तो अकेलेमें मेरा मन न लगेगा। इसलिये इस लँगड़ेको आप कन्धे पर रखकर ले चले', तो मुझे बातचीत का सहारा हो जायगा।' ब्राह्मण बोला—'प्यारी! मुझे अपना शरीर ही भारी हो रहा है, मैं इसे न ले चल सकूँगा।' तब स्त्रीने स्वयं उसे गाँठमें बाँधकर अपने सिर पर धर लिया। ब्राह्मण ने उसकी बातोंमें आकर ई कार नहीं किया। कुछ दिनों बाद वे एक और गाँवके निकट पहुँचे। ब्राह्मण कूप से पानी भरने लगा। उसकी स्त्रीने उसे कूपमें धकेल दिया और अपनी गठड़ी को लेकर आगे चल दी। पुलिसने चोरीका माल समझ कर

( २८५ )

उसकी गठड़ी खुलवाई, तो उसमें लैंगड़ा निकला। सिपाही उसे हाकिमके पास ले गये। हाकिम ने पूछा—'यह क्या मामिला है ?' तू ने मर्दको गठरीमें क्यों बाँध रखा है ?'

ब्राह्मणीने जवाब दिया—'यह मेरा पति है। यह चल नहीं सकता, इसलिये मैं इसे गठरीमें धरकर घूमती हूँ। महाराज ! पतिव्रताका यही धर्म है।' हाकिम उसकी बातसे खुश होकर उसे राजाके पास ले गया। राजा उसका पतिन्हे देखकर बहुत ही प्रसन्न हुआ और उसे आनन्दसे जीवन बितानेके लिए दो गाँव इनाममें दिये।

कुछ रोज बाद वह ब्राह्मण भी किसी तरह क्रूर से निकलकर उसी नगरमें आया। उस स्त्रीने उसे देखते ही राजासे प्रार्थना की, कि महाराज ! यह आदमी मेरे पतिका शत्रु है। राजाने सुनते ही, बिना विचार किये, ब्राह्मणको शूली पर चढ़ाने की आज्ञा दे दी। तब ब्राह्मणने राजासे कहा—' आप धर्मात्मा राजा है, आपने मुझे दण्ड दिया, सो तो मैं भोगूंगा ही, पर इसके पास मेरी कुछ संकान्त वस्तु है, वह मुझें दिला दीजिये। इसके बाद मुझें फाँसी पर चढ़वाइये।' राजाने कहा—'हे पतिव्रते ! तूने इसकी कुछ संकान्त वस्तु ली है ?' ब्राह्मणीने कहा—'मैंने तो इससे कुछ भी नहीं लिया है।' ब्राह्मण बोला—'तू हाथमें पानी लेकर तीन बार यह कह दे, कि इसने मुझे जो कुछ भी दिया हो, वह मैं वापस देती हूँ।' स्त्री राजाके भयसे इस बात पर राजी हो गई और तीन बार

( २८६ )

चैसा ही कहकर संकल्प छोड़ दिया। संकल्पका जल छोड़ते ही वह मर गई। राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ। राजाने विपसे इस घटनाका रहस्य पूछा। ब्राह्मणने सारा किस्सा ज्योंका त्यों सुना दिया। सुनते ही राजाने खुश होकर वह दोनों गाँव ब्राह्मणको दे दिये और अपने दरबारमें एक उच्च पद भी प्रदान किया।

इसीसे मुझे कहना पड़ता है कि, जिस ब्राह्मणने अपनी स्त्रीके लिये माँ-बाप और भाई-बन्धु छोड़े, अपना आधा जीवन दिया, उसी स्त्रीने उसके साथ ऐसे-ऐसे जाल किये, उसके प्राण-नाशमें भी कोई बात उठा न रखी। अब कहा, स्त्रियोंकी प्रीतिका क्या विश्वास किया जाय ? किसीने ठीक ही कहा है—

एताः स्वार्थपरा नार्थः, केवलं स्वसुखे रताः ।

न तासां बल्लभः कोऽपि, सुतोऽपि स्वसुखं विना ॥

स्वार्थपरायणा स्त्रियाँ केवल अपना सुख ही चाहती हैं। अपने सुखके आगे उन्हें कोई भी प्यारा नहीं—यहाँ तक कि अपने पेटसे पैदा हुआ पुत्र भी प्यारा नहीं।

अच्छा और भी एक कहानी सुन :—

“किसी नगरमें एक वैश्य रहता था। वह अपनी स्त्रीको अत्यधिक प्यार करता था। उसके मित्रोंने कहा—‘भाई ! तुम अपनी स्त्रीका इतना विश्वास मत करो ; स्त्रीकी प्रीतिका ज़रा

( २८७ )

भी भरोसा नहीं। रुबी चीज़में चिकनाई हो, कठोर वस्तुमें नरमी हो और नीरसमें रस हो, तो स्त्रियोंमें प्रेम हो सकता है।

‘मित्र ! तुम अपनी स्त्रीके झूठे प्रेममें पागल मत बनो। अगर मेरी बातपर विश्वास नहीं है, तो आज उससे विदेश जानेकी बात कहो, पर जाओ कहीं नहीं ; दिनभर मेरे घरमें रहो, रातको अपनी स्त्रीके पल्लगके नीचे घुस जाओ और तमाशा देखो।’

उस वैश्यने अपने मित्रके कहनेके मुताबिक ही अपनी स्त्रीसे विदेश जानेकी बात कही। वह भी सुनते ही प्रसन्न हो गई और उसके लिए पूरी मिठाई प्रभृति बनानेमें लग गई। किसीने कहा है—

दुर्दिवसे धनतिमिरे वर्पतिजलदे महाटवीप्रभृतौ ।

पत्युविदेशगमने परमसुखं जघन चपलायाः ॥

घटाटोप दिन या बुरे दिनोंसे, गहरे अँधेरेसे, मेह बरसनेसे, महावनसे और पतिके प्रदेश जानेसे चपल जाँघोंवाली परपुरुषरता स्त्रियाँ बहुत खुश होती हैं।

बहुत क्या, वैश्य की स्त्रीने पूरी मिठाई बाँधकर पतिको विदा कर दिया। चलते समय कहा—‘आप जल्दी आजाना। मुझे आपके बिना यह मनोहर शय्या कौंटोंसे भरी मालूम होगी। रातभर नींद न आवेगी। खैर, काम है, इसलिए जैसे-तैसे दिन काटूँगी।’

( २८८ )

पतिके चले जानेपर शामको उसने सावुनसे मल-मलकर खूब स्नान किया। नये-नये कपड़े और गहने पहने। कसकर पलंग तैयार किया और दूधके समान सफेद चादर बिछाई। रातको उसका यार आया और पलंगपर बैठ गया। उधर वह वैश्य भी चिराग जलते ही, दूसरे द्वारसे आकर, पलंगके नीचे छिप गया। ज्योंही वह स्त्री पलंग पर चढ़ने लगी कि, उसका पैर खाटके नीचे छिपे हुए उसके पतिसे छू गया। वह फौरन ताड़ गई कि, दुष्ट पति मेरी परीक्षा लेनेके लिए यहीं छिपा है। अब कोई बिया चरित्र करना चाहिये। ज्योंही उसका यार उसे आलिङ्गन करनेको तैयार हुआ, वह बोली—'हे महानुभाव ! आप मेरा शरीर न छूएँ। मैं पतिव्रता और महा सती हूँ। अगर छूओगे तो शाप देकर भस्म कर दूँगी। ये बातें सुनतेही उसका यार बोला—'फिर तूने मुझे बुलाया ही क्यों है ? अगर सती थी तो मुझे न बुलाती।' वह बोली—'सुनो, मैं आज देवीके दर्शन करने गई थी। देवी बोली—'पुत्री ! तू मेरी भक्त है, पर दुःख है कि तू आगामी छह महिनामें विधवा हो जायगी। हाँ, अगर तू आज रातको पर पुरुषको बुलाकर उसे आलिङ्गन करे, तो तेरे पतिको उग्र बढ़ जाय और उस पुरुषकी उग्र घट जाय। बस इसी मनोरथ-सिद्धिके लिए मैंने आपको बुलाया है।' नीचेसे अपनी स्त्रीकी बातें सुनकर वैश्य बोला—'धन्य पतिव्रते धन्य ! कुलका आनन्द वन्दन करनेवाली धन्य ! मैंने दुष्टोंकी बातोंमें आकर तेरी परीक्षा लेनी चाही थी। लेकिन तू तो पतिव्रताओंमें

( २८६ )

मुख्य है। तूने पत्तिकी आयु बढ़ानेके लिए ऐसा घोर तप किया, जो परपुरुषके साथ आलिङ्गन करनेको तैयार हो गई ! मेरा जैसा भाग्यवान् कौन है ? आ ! मेरे कन्धे पर चढ़ जा ! फिर उस स्त्रीके यारसे कहने लगा—'हे महानुभाव ! आप मेरे पूर्वजन्मके पुण्यसे आये हैं। आपकी कृपासे मेरी आयु बढ़ गई। आपको धन्यवाद है। आप भी मेरे कन्धेपर चढ़िये !' वह यार तो चढ़ना नहीं चाहता था, पर उसने उसे ज्वर्दस्तो चढ़ा लिया और दोनोंको कन्धोंपर लिये हुए नाचता फिरा। साथ ही उन दोनोंका गुणानुवाद भी करता रहा।

देखा बच्चा ! स्त्रीमें कितनी तेज अङ्क है। सरासर कुकम्मे देखकर भी वैश्य शान्त हो गया ; उल्टा अपनी स्त्रीकी बड़ाई करने लगा। यह सब वैश्यकी स्त्रीकी चतुराईका फल था। स्त्रियोंको जितनी जल्दी बात सूझती है, उतनी जल्दी पुरुषोंको नहीं। इसीसे कहा है—

भोजनं द्विगुणं स्त्रीणां, बुद्धिः कृते चतुर्गुणा ।

निश्चयः षड्गुणः पुंभ्यः, कामारचाष्टगुणः स्मृतः ॥

स्त्रीणां द्विगुणाहारो, लज्जा चापि चतुर्गुणा ।

साहसं षड्गुणञ्चैव कामारचाष्टगुणाः स्मृतः ॥

स्त्रियाँ मर्दोंकी अपेक्षा दूना खाती हैं। उनमें मर्दोंसे चौगुनी अङ्क, छः गुना निश्चय और अठगुना काम होता है।

१६

( २६० )

स्त्रियोंमें पुरुषोंकी अपेक्षा दूनी भूष, चौगुनी शर्म, छह गुना साहस और अठगुना काम होता है।

उशना वेद यच्छावंत्रं, यच्च वेद वृहस्पतिः।

की बुद्धया न विशिष्येतु, तस्माद्रुच्याः कथं हि ताः ॥

शुक और बृहस्पति जितने शास्त्रको जानते हैं, उतना स्त्रीका बुद्धिके सामने कुछ भी नहीं है। फिर स्त्रियोंकी रक्षा की जाय तो कैसे की जाय ?

क्यों बच्चा सन्तोष हुआ या और भी सुनना चाहता है ? अच्छा ले, एक बात और भी सुनाता हूँ,—

जाटनी और नायनका त्रिया चरित्र

“किसी नगरमें एक जाट रहता था। उसकी स्त्री कुलटा थी, पर उस बेचारेको यह बात मालूम नहीं थी। हाँ, उसके यार-दोस्त उसकी स्त्रीका हाल जानते थे। वह कहते—‘यार ! स्त्रीकी प्रीति किसी एकसे नहीं होती। स्त्री पर विश्वास करना बड़ी भूल है।’ उसके दिलमें अपने मित्रोंकी बात जम गई। वह उसको फिराकमें रहने लगा। एक दिन उसने एक संन्यासीको अपने घर भोजन कराना चाहा, इसलिये वह उसे अपने घर लिखा लाया। स्त्रीसे कहा—‘तू महाराजकी सेवा कर, मैं बाज़ारसे खीरका सामान ले आता हूँ, क्योंकि महारामजी कहते हैं—

( २६१ )

अमृतं शिशिरे वहिनमृतं प्रियदर्शनम् ।

अमृतं राजसम्मानमृतं क्षीरभोजनम् ॥

जाड़ुमें आग अमृत है, प्यारेका दर्शन अमृत है, राज-सम्मान अमृत है और खीरका भोजन अमृत है। इसलिये आज खीर ही बनेगी। देख, इधर-उधर मत टरख जाना।' वह तो ऐसा कहकर चल दिया। उसके जाते ही स्त्री गहने-कपड़े पहनकर संन्यासी से बोली—'आप वैडिये, मैं अपने सबीसे मिलकर अभी आती हूँ।' संन्यासीसे ऐसा कहकर वह चल दी। देवयोगसे, राहमें उसका एति उसे मिल गया। उसने देखते ही कहा—'रॉड! मैं लोगोंकी बात कूटी समझता था। पर आज मालूम हुआ, कि उनकी बात सच है। चल, तुझे आज सज़ा दूँगा। ऐसा कहता हुआ, वह उसे अपने घर ले आया। घरमें आकर, उसे खूब मारी-पीटी और कसकर एक खंभेसे बाँध दी। फिर अपने हाथोंने ही पकाकर साधुको खीर खिलाई और अपने भी खूब शराब पीकर खीर खायी। फिर वह नदोमें सो गया।

आधी रात बीतने पर, जाटको सूता समझकर, उसकी एक सखी या दूती-नायन उस स्त्रीके पास आकर कहने लगी—'देख, तेरा यार तेरे बिना मर रहा है! तु क्यों नहीं जाती?' उसने कहा—'देखती नहीं, इस हालतमें कैसे जाऊँ?' नायन ने कहा—'कठिन स्थानमें जाकर जो खादु फल खाते हैं, उन्हींका