शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २४७ )
स्मृता भवति तापाय दृष्टा चोन्मादवर्द्धिनी ।
स्पृष्टा भवति मोहाय सा नाम दयिता कथम् ॥७३॥
जो स्त्री स्मरणमात्र करनेसे सन्ताप करती है, देखते ही उन्माद बढ़ाती है और छूते ही मोह उत्पन्न करती है, उसेन जाने क्यों प्राणप्यारी कहते हैं ॥७३॥
खुलासा—जिसके खाली याद आनेसे ही मनमें वेदना सी होने लगती है, जिसके देखनेसे मनुष्य मतवाला और पागल सा हो जाता है और जिसके छूनेसे ही विवेक और ज्ञानका नाश होकर, मोहकी बढ़ती होती है, ऐसी कदम-कदम पर दुःख देने-वाली स्त्रीको लोग प्यारी, प्राणप्यारी, प्रिया, कल्याणी, प्राणाधिका प्रभृति क्यों कहते हैं, यह बात समझमें नहीं आती ?
वास्तवमें स्त्री दुःख और आपदाओंकी खान है, पर लोगोंको यह बात मालूम नहीं होती । वजह यह है कि, हिम्रोटाइज़ करने वालोंकी तरह, स्त्री नज़र-से-नज़र मिलते ही, अपनी जादूमरी आँखोंसे, मदिरा की तरह, मोह पैदा कर देती है । उस मोहसे मनुष्यका ज्ञान नष्ट हो जाता है । ज्ञान नष्ट हो जानेसे उसे कुछ-का-कुछ दीखने लगता है । जिस तरह मोहान्ध पुरुष अभक्ष्यको भक्ष्य, अकार्यको कार्य और दुर्गमको सुगम समझने लगता है ; उसी तरह, साक्षात् विष होने पर भी, मोहान्धको स्त्री विषसी न दीखकर अमृतसी दीखती है । अमृतसी दीखनेकी वजहसे ही कामान्ध पुरुष उसे “प्राणप्यारी” कहते हैं ।