भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २४८ )

दोहा ।

सुधि आये सुधि-डुधि हरत, दरसन करत अचेत ।

परसत मन मोहित करत, यह प्यारी किहि हेत ॥७२॥

73. How can we call a woman "beloved" whose recollection even gives pain, whose very sight increases intoxication of mind and whose touch creates a great sensation in us.

—*

तावेदेवामृतभयी यावलोचनगोवरा ।

चतुः पथाद्भगता विपाद्ध्यतिरिच्यते ॥७४॥

स्त्री जब तब आँखोंके सामने रहती है, तबतक अमृतसी मालूम होती है ; किन्तु आँखोंकी ओट होते ही, विषसे भी अधिक दुःखदायिनी हो जाती है ॥७४॥

खुलासा—स्त्री पुरुषके पास होनेसे निश्चय ही अमृत सी मालूम होती है ; क्योंकि वह अपने हाव-भाव, कटाक्ष और मधुर वचन तथा सेवा प्रभृतिसे पतिके चित्तको हार्यमें लिये रहती है ; पर अलग होते ही मनमें भारी विरह-वेदना करती है । वियोग-विकल पुरुषका खाना-पीना और नियमित समय पर सोना प्रभृति छूट जाता और साथ ही स्वास्थ्य तक नष्ट हो जाता है । स्त्रीका विरह पुरुषके शरीर पर जहरका काम करता है । उसके मर्ममें घोर सन्ताप होता है । इसीसे कहा है कि, स्त्री आँखोंके सामनेसे हटते ही विषवत् हो जाती है ।

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