शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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दिवानिशं वारिणि कण्ठद्वन्ने दिवाकराराधनामार्चन्ती ।
वद्गोजतायै किमु पद्मलाह्यास्तपश्चरत्यंबुजपंक्तिरप्रा ॥ ३ ॥
जलमें कण्ठ तक रहकर, दिन रात सूर्यकी आराधना करने वाली, यह कमलोंकी कृत्तार क्या सुनयनी नायिकाके कुछ बननेके लिये तप कर रही है ?
आननं भृगशावाह्या वीक्ष्य लोलालकाहृतम् ।
भ्रमद्भ्रमरसम्भारं स्मरामि सरोरुहम् ॥ ४ ॥
हिरनके बच्चेकी सी आँखोंवाली सुन्दरीके मुँहको चञ्चल अलकोंसे ढका हुआ देखनेसे मुझे ऐसा मालूम होता है, गोया कमलके ऊपर भौरोंका झुण्ड घूम रहा है ।
जगदन्तरमभुतभयैर्यशुभिराप्रयन्त्रितराम् ।
उदयति वदनव्याजात् किमु राजा हरिणशावनयनायाः ॥५॥
भृगशावकनयनीके चेहरेके बहानेसे संसार को अपनी अमृत-मय किरणोंसे भर देनेके लिये, क्या चन्द्रमा उदय हुआ है ?
तिमिरं शारदं चन्द्रिं चन्द्रिकाः कमलविटुम चम्पककोरकाः ।
यदि मिलकति तदापि तदाननं खलु तदा कलया तुल्यामहे ॥६॥
घोर अन्धकार, शरदका चन्द्रमा, चाँदनी, कमल, मूँगगा और चम्पाकली,— ये सब अगर किसी समय एकही पदार्थमें इकट्ठे पाये जायें, तो मैं उस नायिकाके चेहरेके एक अंशकी तुलना कर सकूँ ; यानी घोर अन्धकारसे उसके काले-स्याह बालोंकी, शरद