शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २३५ )
दृष्ट्वा मायति मोदतेऽभिरमते प्रस्तौति जाननपि प्रत्यज्ञाशुचिपुत्तिकां स्त्रियमहो मोहस्य दुश्चेष्टितम् ॥७२॥
अहो ! मोहकी कैसी विचित्र महिमा है कि, बड़े-बड़े विद्वान् पण्डित भी, प्रत्यज्ञा ही अपवित्रताकी पुतली—लौको देखकर मोहित हो जाते हैं , उसकी स्तुति करते हैं, आनन्दित होते हैं, रमण करते हैं और उत्कण्ठित होकर हे कमलनयनी ! हे विशाल नितम्बोवाली ! हे विशालाक्षी ! हे कल्याणि ! हे शुभे ! हे पुष्टपोधरवाली ! हे सुन्दर भौहोवाली प्रभृति नाना प्रकारके सम्बोधनोसे उसे सम्बोधित करते हैं ॥७२॥
खुलासा—खी हर तरहसे अपवित्र और गन्दगी का पिटाशा है । उसके स्तन मांसके लौदे हैं, उसका मुँह कफका आगार है, उसकी जाँघें मूत्रसे अपवित्र रहती हैं और उसके मल-मूत्र त्यागने के स्थानों में दो-अंगुलका भी अन्तर नहीं—ऐसी स्त्रीकी, साधारण नहीं, बड़े-बड़े विद्वान् और पण्डित खुशामद करते हैं, उसे अच्छे-से-अच्छे नामोंसे सम्बोधन करते हैं, यह क्या मोहकी महिमा नहीं है ? मोह उनकी विद्या-बुद्धि और ज्ञानको नष्ट कर देता है, इसीसे वे अपवित्रता की पुतलीको संसारके सभी पदार्थों से अधिक चाहते और प्यार करते हैं । निश्चय ही, मोहने जगत् को अन्ध कर रक्खा है । देखिये, विद्वानोंने स्त्रियोंकी कैसी तारीफें की हैं :—