भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २४ )

पूछिये, जिन्होंने इन सबका आनन्द अनुभव किया या इनका मज़ा उठाया है। जिसने उनका चन्द्रमाके समान प्रेमरससे पूर्ण मुख देखा है, वही कह सकता है कि, उनका मुख देखनेसे रूप देखनेको इच्छुक नेत्र-इन्द्रियकी तृप्ति होती है या नहीं। जिसने सुगमद—कस्तूरीको भी मात करनेवाली उनके मुखकी सुगन्धका मज़ा लिया है, वही कह सकता है कि, उस सुगन्ध से बढ़कर और भी कोई सुगन्ध नासिकाकी तृप्ति करनेवाली है या नहीं। जिसने उनके मञ्जुमलकी भी नरमीको मात करनेवाले शरीर या पैरोंके तल्लों पर हाथ फेरे हैं, वही कह सकता है कि, यह बात कहाँ तक सच है। जिसने उनकी मधुर और रसीली एवं कानोंमें अमृत ढालनेवाली बातें सुनी हैं, वही कह सकता है कि, उनकी मोटी-मोटी बातोंमें क्या मज़ा है। जिसने उनके रूप, यौवन और हाव-भाव तथा विलासोंका ध्यान किया है, वही कह सकता है कि, उनके ध्यानमें कैसा आनन्द है। जिसने ब्रह्मका ध्यान किया है, वही कह सकता है कि, ब्रह्मके ध्यानमें वह आनन्द है, जिसकी समता त्रिलोकीके और किसी आनन्दमें नहीं है। जिसने ब्रह्मका ध्यान ही नहीं किया, वह ब्रह्मानन्दके वर्णनातीत आनन्दकी बातको क्या जाने ? जिसने अनुपम सुन्दरी सुगनयनीके होठोंसे होठ लगाकर अमृत पिया है, वही कह सकता है कि, सुन्दरीके नीचले होठमें अमृत है या नहीं। महाकवि नज़ीर कहते हैं और ठीक ही कहते हैं :—