भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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है, वह तो अब मिट नहीं सकता । अगर यह आज पहले-पहल ही कीचमें फँसती, तो इसे न फँसने देता ; पर यह तो कबकी अग्र हो चुकी है । मैं बहुत दिनोंसे धोखा खा रहा था । अब क्या ? इसलिये धीरज धरकर देखना चाहिये कि, आगे क्या-क्या होता है ।

इस तरह दिलको समझा-बुझाकर, आगेकी नयी घटना देखनेकी राह देख रहा था । कुछ देर बाद देखा, कि करुणा बाहरकी तिद्रीमें आकर खड़ी है । उसके सिरके बाल बिखर रहे हैं और धोती बिल्कुल खुली हुई है । यह तमाशा देखकर मेरी तबियत फिर भड़क उठी । लेकिन थोड़ी देरमें फिर सम्हल गई । सुभे खूब याद है, उसने धोती पहन कर, मेरे हुक्केमें तमाखू चढ़ाई और उसे भीतर दे आई । फिर वह रसोईमें घुसी । वहाँ जाकर उसने देखा कि, वह जो कुछ चूल्हे पर चढ़ा गई थी वह जलकर खाक हो गया है । उसने जली हुई चीज़को धोकर बर्तन साफ़ किया और उसमें फिर कोई चीज़ पकनेको रखी । इन कामों में उसे एक घण्टेके क़रीब लगा । भोजन तैयार हो जानेपर, उसने आसन बिछा दिया । आसनके सामने चौकी रखकर, बग़लमें जलसे भरा एक चाँदीका लोटा और गिलास रख दिया । फिर वह रसोईमें जाकर थाल सजाने लगी । ये सब—कुछ तो देखकर और कुछ अटकल लगा कर मैंने समझ लिया ।

अब ज़ियादा बर्दाश्त न हुई । एकदमसे जोश आ गया । मैं

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