शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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धीरे-धीरे वृक्षसे उत्तरा और चुपचाप बिड़कीकी राह घरमें घुस गया। जाकर क्या देखता हूँ, कि घूलसे भरे हुए पैरोंसे चौकीदार मेरे दूधके समान सफ़ेद और नमॉनर्म पलंग पर बेखबर सो रहा है। भाई, उस समय मेरे दिलको क्या हालत हुई होगी, इस बातका अन्दाज़ा तुम खुद ही कर सकते हो। मैं तो उसे अपने पलंग पर सोते हुए देखते ही जल कर खाक हो गया। पड़ीसे चोटी तक खून गर्म हो गया। क्रोधकी हद न रही। सब तो यह है कि, मैं गुस्सेसे अन्धा हो गया। मुझे जरा भी होश न रहा। सामनेसे देखा कि, चौकी पर चाँदीका थाल रख दिया गया है। सामने ही एक गँडासा पड़ा दीखा। मैंने आव देखी न ताव, चटसे गँडासा उठाकर चौकी-दारकी गर्दन पर मारा और उसका सिर धड़से जुदा कर दिया। इन बातोंके कहनेमें देर लगी है, पर उसका काम तमाम करनेमें देर न लगी। मैं, फौन ही उद्रे पैरों बाहर आकर, उसी वृक्ष पर चढ़ गया।
मेरे वृक्षपर चढ़ जानेके बाद, कहणा रसोईसे निकल कर चौकीदारको भोजनके लिए बुलानेको कमरमें घुसी। वहाँ जाकर उसने देखा कि, बिस्तर खूनसे लथपथ हो रहा है और चौकीदारका सिर धड़से अलग पड़ा हुआ है। वह वहाँका दृश्य देखकर घबरा गई, क्योंकि उसके सरसे पसीना टपक रहा था और होश-हवास फ़ाड़ता थे। बाहर एक शामादान जल रहा था। वह उसके सामने खड़ी होकर, सिरपर हाथ रखकर, कुछ