शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 378, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३२१ )
मेरे घरमें घुसते ही, उसने भटपट बैठनेके लिए आसन बिछा दिया। इसके बाद उसने हुक्का चढ़ाकर मेरे हाथोंमें दे दिया और कहने लगी—“तुम कह गये थे, पता नहीं मैं कितनी रात रहे चला आऊँ, इसलिये अभी तक दिया वाले बैठी हूँ। तुम जैसा कठोर कोई न होगा। श्यामाकी माँको बुलाने आदमी भेजा था, मगर मालूम हुआ कि वह घरमें नहीं है। इसीसे चिराग जलाये बैठी हुई, तुम्हारी राह देख रही हूँ। मालूम होगा है, सवेरा होनेमें अब देर नहीं है।”
हुक्काका जल खराब होनेका बहाना करके, मैंने जेबसे सफ़री हुक्का निकाला और उस पर चिलम रखकर पीने लगा। साथ ही उसकी बातचीतका ढ़ंग और चेहरेका उतार-चढ़ाव देखने लगा। देखा, आज रातको घरमें इतनी गड़बड़ी हो गई है, ऐसी भयङ्कर घटना घटी है, लेकिन उसके चेहरेसे वह बात मालूम नहीं होती। वह पहले जिस तरह प्यार-मुहब्बतसे बातें किया करती थी, आज भी वैसे ही कर रही है। किसी बातमें ज़रा भी फ़र्क नहीं। मैंने पूछा—“बिस्तर चौकमें क्यों पड़ा है ?” उसने भट जवाब दिया—“अकस्मात् विछोने आकर पेशाब कर दिया। क्या करती, लाचार होकर कपड़े पानीमें भिगो दिये हैं। रातको तालाब पर कैसे जा सकती थी ?” मैंने पूछा—“यह आसन किस लिए बिछा हुआ है ?” उसने कहा—“आपके सिवा और किसके लिये ? आप आयेगे, इसलिये सब तरहकी तैयारी कर रखी है। भोजन-भोजन सब तैयार
२१