भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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है। सिर्फ़ खाने-भरकी देर है। लाऊँ क्या ? आप थके हुए हैं, इसीसे विलम्ब कर रही हूँ।” मैंने कहा—“अभी नहीं खाऊँगा। रातको बहुत खा लिया था, इसलिये पेट भरा हुआ है। ज़रा बड़ी बोरो तो लाओ। कुछ काम है।” उसने कहा—“उस पर बिछीने हग दिया था, इसलिये वह भिगो रखी है।” मैंने कहा—“यहाँ जो कुंदाँल रखो था, वह कहाँ गया ?” उसने कहा—“अमृत बावूका लड़का ले गया था, पर जब उसने लौटा कर दिया तो वह कीचमें सना हुआ था, इसलिये उसे भी पानीमें भिगो रखा है।” उसके ये सब जवाब सुनकर मैंने झुँभलाते हुये कहा—“इस बड़े घेलेमें कुछ रख और फिर उसे दमशान-घाट ले जाकर क्या किया था ?” मेरी यह बात सुनते ही, उसके सम्मुखमें कुछ शेष न रहा। उसने एकदमसे जल-भुनकर कहा—“ओह ! तुही वह कलमुहाँ है ?” यह कहते हुए, उसने सामने रखा हुआ गंडासा उठाकर मेरी पीठ पर मारा। मैं उससे कुछ न कह, अपनी पीठपर पट्टी बाँध, चुपचाप घरसे निकल आया। इस समय सूरज पूरा ऊँचा चढ़ आया था। लोग अपने-अपने काम-धन्वोंमें लग गये थे। मैंने कहा शास्त्रमें ठीक ही लिखा है—

आस्तां तावत्किमन्येन दौरात्म्येनेह योषिताम् ।

विधृतं स्तोद्रेणापि ध्वन्ति पुत्रं स्वर्कं रूपा ॥

स्त्रियोंके दौरात्म्यको हृद नहीं—ये नाराज़ होकर अपने पेटसे निकले हुए पुत्रको भी मार डालती हैं।