भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

( ३२२ )

है। सिर्फ़ खाने-भरकी देर है। लाऊँ क्या ? आप थके हुए हैं, इसीसे विलम्ब कर रही हूँ।” मैंने कहा—“अभी नहीं खाऊँगा। रातको बहुत खा लिया था, इसलिये पेट भरा हुआ है। ज़रा बड़ी बोरो तो लाओ। कुछ काम है।” उसने कहा—“उस पर बिछीने हग दिया था, इसलिये वह भिगो रखी है।” मैंने कहा—“यहाँ जो कुंदाँल रखो था, वह कहाँ गया ?” उसने कहा—“अमृत बावूका लड़का ले गया था, पर जब उसने लौटा कर दिया तो वह कीचमें सना हुआ था, इसलिये उसे भी पानीमें भिगो रखा है।” उसके ये सब जवाब सुनकर मैंने झुँभलाते हुये कहा—“इस बड़े घेलेमें कुछ रख और फिर उसे दमशान-घाट ले जाकर क्या किया था ?” मेरी यह बात सुनते ही, उसके सम्मुखमें कुछ शेष न रहा। उसने एकदमसे जल-भुनकर कहा—“ओह ! तुही वह कलमुहाँ है ?” यह कहते हुए, उसने सामने रखा हुआ गंडासा उठाकर मेरी पीठ पर मारा। मैं उससे कुछ न कह, अपनी पीठपर पट्टी बाँध, चुपचाप घरसे निकल आया। इस समय सूरज पूरा ऊँचा चढ़ आया था। लोग अपने-अपने काम-धन्वोंमें लग गये थे। मैंने कहा शास्त्रमें ठीक ही लिखा है—

आस्तां तावत्किमन्येन दौरात्म्येनेह योषिताम् ।

विधृतं स्तोद्रेणापि ध्वन्ति पुत्रं स्वर्कं रूपा ॥

स्त्रियोंके दौरात्म्यको हृद नहीं—ये नाराज़ होकर अपने पेटसे निकले हुए पुत्रको भी मार डालती हैं।

शुभारम्भानक

उसने मेरे बैठने के लिए सट्टार खासन बिछा दिया। इसके बाद हुआ जूठा कर मेरे हाथों में दे दिया। मेरी बात सुनते ही वह सब समझ गई और जवा-मुन कर बोली—“खरे! तुझे वह कलसुख है।” यह कहते हुए उसने सामने रखा हुआ

गंगासा उद्यानर मेरी पित्त प्य मारा।

POPLAR PRESS—CALCUTTA

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( ३२३ )

इस समय यहाँसे निकल भागनेमें ही जीवनकी ख़ैर है। यह हत्यारी मुझे मारे बिना न छोड़ेगी। अगर और तरह न मार सकेंगी, तो विष खिलाकर या किसी और तरह मार डालेगी। जीवन रहेगा, तो अपनी मोक्ष या अपने उद्धारका उपाय तो कर सकूँगा। ऐसा विचार करके, मैं वहाँसे फौल ही नौ दो ग्यारह हुआ। गलियोंमें छिपता हुआ, अपने उसी उपदेशक मित्रके पास पहुँचा। मित्रने मेरी हालत देखकर पूछा—“कहो, क़ौर तो है ? यह क्या हाल है ? पीठमेंसे खून क्यों बह रहा है ?” मैंने पहले महाकवि अकबरका यह शेर कह सुनाया—

जिसकी उल्फ़त का बड़ा दावा था अकबर ! कल तुम्हें । आज हम जाकर उसे देख आये, हरजार्द तो हैं ॥

भार्द, जिसकी मुहब्बतका हमें कल बड़ा घमण्ड था, आज उसे हमने देख लिया ; वह तो कुछ नहीं, निरी हरजार्द है। मित्र ! तुमने सच कहा था ; पर समय आये बिना काम नहीं होता। बिस्वर्मगलको महात्मा नारदने बहुत समझाया, पर उन्होंने वैश्याका संग न छोड़ा। लेकिन समय आने पर फौलन ज्ञानोदय हुआ और उन्होंने उसे त्याग दिया। मैंने आपकी बातें मानकर, कल रातको स्त्रीकी परीक्षा की। वह तो अब्बल दर्जकी कुलटा निकली। वह अपनी गलीमें पहरा देनेवाले नौच चौकोदारसे फँसी थी। इसके बाद मैंने सारी कहानी आदिसे

( ३२४ )

अन्ततक सुना दो । मित्रने पुलिसके भयसे मुझे एक गुप्त स्थानमें छिपा दिया और जब तक मुझे पूरी तरहसे आराम न हो गया, मेरी खूब ही सेवा-शुश्रूषा की ।

इस घटनासे मेरा दिल ऐसा खट्टा हुआ, कि मैंने अपनी सारी दौलत उसी कुलटके पास छोड़कर जड़लकी राह ली । मुझे अब संसार अत्यन्त दुःख मालूम होता है । जब-कभी मेरे मनमें वेदना होती है, वह श्लोक मेरे मुँहसे निकल जाता है । अब तो मैं सभीको उपदेश देता रहता हूँ कि भाइयो ! स्त्री-जातिसे सावधान रहो । इस काली नागिनका विश्वास मत करो । जो इसके फन्देमें फँसकर ईश्वरको भूलता है, अपना मनुष्य-जन्म बुरा गँवाता है । स्वामी शंकराचार्यने बहुत ठीक कहा है—

का ते कान्ता कस्ते पुत्रः ।

संसारोऽयमतीव विचित्रः ॥

कस्य त्वं कः कुतः आयातः ।

तत्त्वं चिन्तय यदिदं भ्रातः ॥

भजगोविन्दं भजगोविन्दं गोविन्दं भज मृदु मते ॥

कौन तेरी स्त्री है ? कौन तेरा पुत्र है ? यह संसार अतीव विचित्र है । हे भाई ! इस असल बातको विचार कर कि, तू कहाँसे आया है ? कौन तेरा है ? अरे मृदु ! सबको तज और गोविन्द को भज ।

( ३२५ )

बकौल मौलाना हाली—

रंजिशो इलतफातो नाजो निथाज ।

हमने देखे धृहत नशेवो फराज ॥

सुख-दुख, मिलन और विरह प्रभृति संसारके उतार-चढ़ाव हमने खूब देख लिये। अब हमारी तो यह राय है कि, इस संसारमें अपना कोई नहीं है। सभी अपना-अपना मतलब गाँठ-नेको हमारे बने हुए हैं। सच्ची मुहब्बत किसीमें भी नहीं। यद्यपि दुनिया धोखेकी टट्टी है, तोभी सारा संसार इसमें फँसा हुआ है। क्या किया जाय, बिना फँसे काम भी तो नहीं चलता। सब फँसते हैं, पर कोई दाना—चिचाखान नहीं फँसता। जो नहीं फँसता, वही इह लोक और परलोकमें सुख पाता है। किसी कविने खूब कहा है—

दुनिया ने किसका, राहें फ़नामें दिया है साथ ?।

तुम भी चले चलो यूँही, जब तक चली चले ॥

संसारने किसीका साथ नहीं दिया। इसलिये जबतक यह चल रहा है तुम भी चले चलो—इससे दिल मत लगाओ। दिल लगाओ तो—इसके बनानेवालेके साथ लगाओ; क्योंकि अन्तमें वही दयामय काम आयेगा। यों तो वह दयामय जेमाँत्मा और पापात्मा सभी पर दया करता है, पर धर्मात्मा उसे विशेष प्यारे हैं। इसलिये धर्म संग्रह करना चाहिये। कहा है:—

( ३२६ )

अनित्यानि शरीराणि, विभवे नैव शाश्वतः ।

नित्यं सविहतो मृत्युः, कर्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥

शरीर अनित्य है—हमेशा नहीं रहेगा, ऐश्वर्य्य भी सदा नहीं रहेगा और मृत्यु सदैव निकट है, इसलिये धर्म संग्रह करो ।

यस्य धर्मविहीनानि दिनान्यायान्ति यान्ति च ।

स लोहकारेभस्त्रेव श्वसनपि न जीवति ॥

धर्मके बिना जिसके दिन आते और जाते हैं, वह लुहार की धौकनीकी तरह साँस लेता हुआ भी नहीं जीता ।

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मधु तिष्ठति वाचि योषितां हृदि हलाहलमेव केवलम् ।

अतएव निपीयतेऽथरो हृदयं मुग्धिभिरैव ताव्यते ॥८२॥

स्त्रियोंकी बातोंमें अमृत और हृदयमें हलाहल विष होता है ; इसीलिए पुरुष उनका अधरामृत पान करते और उनकी छान्तियोंको मर्दन करते हैं ।

खुलासा—मनुष्य का स्वभाव है कि, वह अमृतको शौकसे पीता और विषसे घृणा करता है ; इसलिये पुरुष स्त्रियोंके नीचले होठोंको चूसते और उनके कुचोंको मलते (पीटते) हैं ; क्योंकि उनके होठोंमें अमृत और कुचोंके नीचे हृदयमें विष रहता है ।

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महाकवि कालिदास स्त्रियोंके मनमोहन रूपसे खुश और उनके हृदय की कठोरतासे दुःखित होकर कहते हैं :—

इन्दीवरेण नयनं मुखमंजुजेन कुन्देन दन्तमधरं नवपल्लवेन । अंगानि चम्पकदलैः स विद्याप्रवेशा कान्ते ! कथं घटितवानुपलेनचेतः ।

हे प्यारी ! उस ब्रह्माने, नील कमलसे नेत्र, कमल सा मुख, कुन्दसे दाँत, नये पत्तों जैसे होठ और चम्पाके पत्तोंके समान अन्यान्य अङ्ग बनाकर, स्त्रीका हृदय पत्थरसे क्यों बनाया ?

स्त्रियोंका हृदय पत्थरके समान होता है, इसमें शक नहीं। इस हृदयके कठोर होनेके कारणसे ही उनमें दया, वफा और मुहब्बत नहीं होती। जो उनके ऊपर जान देता है, जो उनकी इच्छा पूरी करनेके लिये दिन-को-दिन और रात-को-रात नहीं समझता, जो उनके लिए घोर परिश्रम करता और तरह-तरह की ज़िल्लते सहाता है, उनको धन और गहने देता, उनका मान रखता और खुशामद करता एवं रतिकीड़ासे उनको अच्छी तरह सन्तुष्ट करता है, उसको भी वे निर्दयता-पूर्वक, जरा सी देरमें, त्याग कर बली जाते हैं। ऐसे स्त्रियोंका हृदय यदि पत्थरका नहीं, तो किसका है ?

दोहा ।

अधरन में अमृत बसत, कुच कठोरता वास ।

यातें इनको लेत रस, उनको मर्दन त्रास ॥८२॥

( ३२८ )

सार—स्त्रीका दिल पत्थरसे बना है और उसमें विष भरा है ; इसीसे उसमें वफ़ादारी नहीं, किन्तु निर्दयता, छल, कपट, दगाबाज़ी और फरेब प्रभृति दुर्गुण भरे हैं ।

82. There is sweetness in the speech of a woman and poison in her heart ; therefore, the lips are tasted and the breasts are pressed by the fist.

—✻—

एक स्त्रीकी परले सिरैकी वेवफ़ई ।

—◊◊◊—

अपूर्व विद्याचरित ।

प्राचीन कालमें, अमरावती नामकी एक नगरी बहुत ही उन्नत दशामें थी । चारों दिशाओंसे व्यापारी देश-देशोंका माल लेकर वहाँ आते थे और उस प्रान्तका माल दूर देशोंमें ले जाते थे । व्यापारकी वजहसे उस नगरकी समृद्धि दिनरात बढ़ती थी । उस नगरमें सैकड़ों करोड़पति थे । लखपतियोंकी तो गिन्ती ही न थी । शहरके सारे साहूकारोंमें रतनसेन नामका एक साहूकार सबसे अधिक धनी था । उसे कोई खरबपति और कोई खरबपति कहता था । उसका धन-वैभव देख्दर, धनेश-कुवेर लाजके मारे मुह छिपाकर, हिमाचलके एक अश्रुल्लमें जा छिपा था । आजकलके अमेरिकन धन-कुवेर रॉकफेलर,

( ३२६ )

कारनीगो और फोर्ड भी उसके सामने तुच्छ थे। भारतमें तो आजकल वैसा धनी मशाल लेकर दूँहनेसे भी न मिलेगा। उसके धनका अन्दाज़ा इसीसे लगा लीजिये, कि वह नित्यप्रति नौ लाखका एक रत्न-जटित कम्बल ओढ़ता और सवेरा होते ही उस कम्बलकी रङ्गम गुरीबोंको बाँट दी जाता थी।

संसारमें सर्वसुखी कोई नहीं रहता। भगवान्ने सुखिया-से-सुखियाके पीछे एक न एक दुःख लगा रखा है। यद्यपि रत्नसेन सारे भारतमें अद्वितीय धनशाली था। उसके सुख-वेमवको देख कर स्वर्गके देवताओंको भी ईर्ष्या होती थी। पर रत्नसेन, अटूट धन-सम्पत्ति होने पर भी, सन्तानके लिए दुखी रहता था ; क्योंकि इस अपार सम्पत्तिको भोगनेवाला कोई न था। उसने सन्तानके लिये तन्त्रमन्त्रके जाननेवाले पण्डितोंसे अनेकों यह, हवन और अनुष्ठान कराये। इन सब कर्मकाण्डोंके फलस्वरूप या पूर्वजन्मके पुण्योंका समय आनेसे, उसके एक अपूर्व रूप-लावण्यवती परमा सुन्दरी कन्याने जन्म लिया। सेठके महलों में नौबत बजने लगी। गुरीब और मुहताज़ोंको इतना धन लुटाया गया कि, उस नगरमें एक भी कँगाल न रहा। कितने ही जन्म-दरिद्री तो लखपती बन गये।

रत्नसेनने उस कन्याका नाम कन्दर्पकला रखा। जन्मसमये एक कन्या पानेसे, सेठ उसका ठालन-पालन राजकुमार और राजकन्याओंसे भी अच्छा करने लगा। कन्या भी चन्द्रकलाकी तरह बढ़ने लगी। समय बीतते क्या देर लगती है ? कन्दर्प-

( ३३० )

कला पाँच बरस की हो गई। सेठने कन्या की शिक्षा प्रभुतिके सम्बन्धमें पण्डितोंसे राय ली। पण्डितोंने कहा—“सेठ साहब! कन्याको पहले अच्छी शिक्षा दिलाइये। जिस तरह पुत्रको विद्याभ्यास कराना चाहिये; उसी तरह कन्याको भी विद्या पढ़ानी चाहिये। अशिक्षिता कन्या ग्रहणी रूपी गाड़ीको उचित रूपसे चला नहीं सकती। “हेमाद्री-धर्मशास्त्र”में लिखा है:—

कुमारीं शिष्येद्विद्यां, धर्मनीतीं निवेशयेत् । द्वयोः कल्याणदा श्रोका, या विद्यामधिगच्छति॥

ततो वराय विदुषे, कन्या देया मनीषिभिः । एषः सनातनः पन्था, ऋषिभिः परिगीयते॥

अज्ञातपतिमर्यादाम्, अज्ञातपतितेवनाम् । नोद्गाहयेत पिता बालाम्, अज्ञानधर्मशासनाम्॥

कँवारी कन्याको विद्या पढ़ानी चाहिये और धर्मनीति सिखानी चाहिये, क्योंकि जो कन्या विदुषी होती है, वह मर्ग और बाप—दोनोंके कुलोंका कल्याण करती है।

जब कन्या विद्या और धर्मनीतिमें दक्ष हो जाय, तब किसी विद्वान् वरके साथ उसका विवाह कर देना चाहिये। ऋषियोंने यही सनातन रीति बतलाई है।

जब तक कन्या पति की मर्यादा और पतितेवा की विधि

( ३३१ )

न जान ले और धर्मशासनसे अनजान रहे, तब तक उसकी शादी न करनी चाहिये ।

पण्डितों की व्यवस्था लेकर सेठने कहा—महाराज ! विद्या पढ़ाने की बात तो मुझे स्वीकार है, पर जितनी विद्या, धर्मनीति और समाजनीति पढ़ाने की बात शाखमें लिखी है, उतना पढ़ने-सीखनेके लिये कम-से-कम दस बरस तो चाहिएँ । अगर कन्दर्पकलाको इतनी ही शिक्षा देने होगी, तो वह कम-से-कम पन्द्रह-सोलह बरस की हो जायगी । उतनी उम्रमें विवाह करनेसे तो हम लोगोंको नरकमें जाना होगा ; क्योंकि शाखमें लिखा है :—

असम्प्रासरजा गौरी, प्राप्ते रजसि रोहिणी ।

अव्यञ्जता भवेत्कन्या, कुवहीना च नयिका ॥

व्यञ्जनैस्तुसमुत्पन्नै, सोमोमुक्तेहिकन्यकाम् ।

पयोधराभ्यां गन्धर्वा, रजस्यसिःप्रतिष्ठितः ॥

तस्माद्विवाहयेत्कन्यां, यावबर्तुमती भवेत् ।

विवाहश्चषष्ठाः कन्यायास्तुप्रशस्यते ॥

व्यञ्जनं हन्ति चै पूर्वं, परं चैव पयोधरी ।

रतिरिष्टास्तथा लोकहृन्याच्चापितरं रजः ॥

श्रुतुभत्यां तु तिष्ठन्त्यां स्वेच्छा दानं विधीयते ।

तस्मादुद्वाहयेत्तथा मनुः स्वायम्बुवोऽववीत ॥

( ३३२ )

पितृवेशमनि या कन्या रजः पश्यत्यसंस्कृता ।

अविवाहा तु सा कन्या, जघन्यावृषलीस्पृता ॥

जब तक लड़की रजोवती नहीं होती, उसे "गौरी" कहते हैं और रजोवती होनेपर "रोहिणी" कहते हैं। जब तक यौवनके चिह्न प्रकट नहीं होते, उसे "कन्या" कहते हैं और कुछ या स्तन न आने तक "नश्रिका" कहते हैं।

जवानीके चिह्न प्रगट हो जाने पर कन्याको चन्द्रमा भोगता है; स्तन आ जाने पर गन्धर्व और रजोवती हो जाने पर अग्नि भोगता है।

इसलिये कन्याको रजोवती या ऋतुमती होनेसे पहले ही—आठ बरसकी उम्रमें—विवाह देना चाहिये।

स्तनादि स्त्री-चिह्न प्रकट हो जाने पर शादी न कर देनेसे पहलेके पुण्य-कर्म नाश हो जाते हैं; स्तन आ जाने पर विवाह न करनेसे परत्र लभ्य पुण्योंका नाश होता है। सुरत या मैथुन-योग्य होने पर शादी न करनेसे स्वर्ग आदि लोक नहीं मिलते और रजोवती होने पर भी विवाह न कर देनेसे पितर या पुरखे नरकमें जाते हैं, इसलिये स्त्री-चिह्न आनेसे पहले ही कन्या का विवाह कर देना चाहिये।

अगर कन्या शादीसे पहले ही ऋतुमती हो जाय, तो उस का विवाह उसको अनुमतिसे करना चाहिये। स्वायुर्भुव मनुने कहा है, इसलिये कन्याका विवाह उसके नश्रिका या रजोरहित होनेकी हालतमें ही कर देना उचित है।

( ३३३ )

जो कन्या बापके घरमें, बिना विवाह हुए, रजोदर्शन करती है—रजस्वला होती है, वह विवाहके अयोग्य और गूढ़ाके समान होती है ।”

पण्डितोंने कहा—“सेठजी ! ये श्लोक स्वार्थियोंने पीछेसे धर्मशास्त्रोंमें घुसेड़ दिये हैं । अगर ऐसा होता, तो “हेमाद्रौ” वाला यह कभी न लिखता कि, जब तक कन्या विद्या न पढ़ ले, धर्मनीति न जान ले, पति-मर्यादासे अनजान रहे, शादी न करनी चाहिये । सीता, सावित्री, द्रौपदी और दमयन्ती प्रभृतिकी शादी पूर्णयौवना होनेपर ही—स्वयम्बर-प्रथाके अनुसार हुई थीं । आठ-दस सालकी कन्या धर्मनीति और पतिमर्यादा आदि नहीं जान सकती । अगर पहलेके समयमें आठ सालकी कन्याकी शादी होती होती, तो महर्षि सुश्रुत सोलह सालकी स्त्री और पच्चीस सालके पुरुषको गर्भाधानके लिए मैथुनकी राय न देते । उन्होंने स्पष्ट कहा है—

पंचविंशो ततोर्वर्षपुमात्रां तू षोडशे ।

समत्वागतवीर्य्या तौ जानीयातकुशलोभिषक् ।।

—————सुश्रुत-सूत्रस्थान, अध्याय ३५

ऊनषोडषवर्षायामप्राप्तः पंचविंशतिम् ।

यदाधत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः स विषद्यते ॥

जातो वा न चिरञ्जीवैत जीवद्वादुर्वलेन्द्रियः

तस्मादत्यन्त बालायां गर्भाधानं न कारयेत् ॥

—————सुश्रुत-शारीरस्थान अध्याय १०

( ३३४ )

“गर्भाधानके समय पुरुषकी उम्र २५ सालकी और कन्याकी १६ सालकी होनी चाहिये, क्योंकि इन अवस्थाओंमें पुरुष और स्त्री में समान बलवीर्य हो जाता है।

“सोलह बरससे कम उम्रकी स्त्रों में अगर पञ्चवीस बरससे कम उम्रका पुरुष गर्भाधान करता है, तो गर्भ कोखमें ही बिगड़ जाता है—बालक पैदा नहीं होता ; अगर पैदा भी होता है, तो बहुत दिन जीता नहीं ; अगर किसी तरह जो भी जाता है, तो कमज़ोर और रोगी होता है ; इसलिये अत्यन्त छोटी उम्र की यानी १६ सालसे कम उम्रकी स्त्रों में गर्भाधान हरगिज़ न करना चाहिये।

“अब आप ही सोचिये, जब सोलह सालसे कम अवस्था की कन्यामें गर्भाधान करनेकी ही मनाही है, तब पहले शादी करनेसे क्या लाभ ? जब तक घर और बधू ‘विवाह’ किस विड़िया का नाम है, इस बातको न समझे, तब तक विवाह में क्या आनन्द है ? अतः आप बाईकी शादी सोलह बरसकी उम्रमें ही करें।” सेठने ब्राह्मणोंकी बात ठीक समझी, अतः स्वीकार कर ली।

समय जाते देर नहीं लगती। कन्दर्पकलाने सोलहवें बरसमें कृदम रखा। माता-पिताको घर खोजनेकी फ़िक पड़ी। नगर-नगर और गाँव-गाँवमें नाई और ब्राह्मण भेजे गये। ईश्वर की दयासे कुल-शील-धन-वैभव प्रभृतिमें समान घर और सुन्दर रूपवान, विद्वान, बलवान और वीर्यवान बर मिल गया। बरका

( ३३५ )

नाम गुणनिधि था । गुणनिधि वास्तवमें ही गुणोंका भाण्डार था । जिस तरह कन्दर्पकला अपने बापकी इकलौती और लाड़ली बेटी थी ; उसी तरह गुणनिधि भी अपने पिताका इकलौता और लाड़ला पुत्र था । लड़की लड़केने एक दूसरेके बिच देखकर एक दूसरेको पसन्द कर लिया । सेठ सेठानीने भी लड़केमें जामाताके सब उत्तम गुण देखकर, उसे अपना जमाई बनाना स्वीकार कर लिया । सेठने सेठानीसे कहा कि, शास्त्रमें भले और खुरे जमाईके लक्षण इस प्रकार लिखे हैं—

जमाईके गुण ।

विद्याशौच्यर्थधनाश्रयो गुणनिधिः ख्याता युवा सुन्दरः ।

सच्चारः सुकुलोद्भवोमधुरवाम् दाता दयासागरः ।

भोगी भूरिकुटुम्बवान् स्थिरमतिः पापार्तिहीनो बली ।

जामाता परिवर्णितः कविवरेरंवरविधः सत्तमः ॥

“विद्वान्, बहादुर, धनवान्, गुणवान्, सच्चरित्र, अच्छे कुलमें पैदा हुआ, मीठा बोलनेवाला, दातार-फ़्रैयाज़, दयाका समुद्र, भोगी, बहुतसे कुटुम्बियोंवाला, स्थिरबुद्धि, धर्मात्मा और बलवान् जमाई अच्छा होता है ।

जमाईके दोष ।

वृद्धो दुर्व्यसनौ दयाविरहितो रोगी महापापवान् ।

घण्टो दुष्कुलोद्भवश्च पिगुनो धूर्त्ताजतिवद्भयहः ।

( ३३६ )

निर्वित्तः ऋणयोऽतिचंचलमतिर्नित्यप्रवासी शृणी ।

भिन्नः स्नेहविवर्जितः सुमतिभिः कार्यावरोनेदृशः ॥

“बूढ़े, बुरे-बुरे व्यसनोंमें फँसे हुए, निर्दयी, रोगी, घोर-पापी, नामर्द, नीच कुलमें पैदा हुए, ख़ुगलख़ोर, धूर्त्त, इच्छा-ओंकों बहुत ही रोकने वाले, निर्धन, कंजूस, बहुत ही चञ्चल-बुद्धि, हमेशा परदेशमें रहनेवाले, कज़्दार, भिखारी और स्नेह-हीन पुरुषको जमाई न बनाना चाहिये ।

“कन्दर्पकी मा ! अपने गुणनिधिमें सभी उत्तम गुण हैं, दूष-षोंका नाम भी नहीं । सच पूछो तो जमाई यथा नाम तथा गुण है, इसलिये गुणनिधिको ही कन्या देना ठीक है ।”

शुभ लक्ष्यमें विवाहकी तैयारी शुरू को गई । दोनों ओरसे विराट् आयोजन हुआ । नियत समय पर गुणनिधिकी बारात आई । शुभ मुहुर्त्तमें गुणनिधिने कन्दर्पकलाका पाणिग्रहण किया । कन्याके पिताने अपनी इकलौती बेटीके दहेजमें करोड़ोंकी सम्पत्ति, हाथी, घोड़े, दास-दासी, रथ और पालकी वगैरः दिये । बाराती और गुणनिधिके पिता अपने नगरको चले गये । दहेजका सामान उनके साथ भेज दिया गया, पर गुणनिधिको कन्दर्पकलाके पिताने अपने घर ही रख लिया । गुणनिधिका बाप सज्जन पुरुष था । उसने अपने समर्थकी बात, यिना किसी विशेष आपत्तिके, मान ली । गुणनिधि सुसरालमें घर-जमाईकी तरह रहकर, स्वर्गीय सुख भोगने लगा । कन्दर्पकला भी उससे सब तरहसे प्रसन्न और सन्तुष्ट थी ।

( ३३७ )

माता-पिता भी अपनी पुत्री और जामाताको प्रेमपूर्वक रहते हुए देखकर फूले नहीं समाते थे।

कुछ समय बीतने पर, रत्नसेनकी आदतमें सुमात्रा, जावा, बोर्युं, चीन, लंका, फ़ारस और रुम देशके व्योपारी तरह-तरहके मसाले, रेशम, रेशमी कपड़े, मोती और शोशा प्रभृति नाना प्रकारका माल लाये। उन व्योपारियोंको मालकी बिक्रीसे प्रचुर धन-लाभ हुआ। अब वे लोग अमरावतीसे यहाँका माल खरीद कर, फिर उन देशोंको जानेकी तैयारी करने लगे। उन लोगोंको खूब धन कमाते देखकर, गुणनिधिका दिल भी यहाँसे माल भर कर उन देशोंमें जानेको हुआ। उसने सास-ससुरसे आज्ञा माँगी। सास-ससुरने इकार किया। कहा—“वेदा ! अपने धनकी कमी नहीं ; अटूट धन-भाण्डार है। तुम्हीं भोगने वाले हो, विदेश जाकर क्या करोगे ?” गुणनिधिने कहा—पिता जी ! वैश्यका धर्म ही धन-वृद्धि करना है। अक्षय धनराशि होने पर भी, वैश्यको सन्तोष न करना चाहिये। देखिये, शास्त्रमें लिखा है—

कोऽतिभारः समर्थानां, किं दूरं व्यवसायिनाम् ।

को विदेशः सुविद्यानां, कः परः प्रियवादिनाम् ॥

“सामर्थ्यवानोंके लिए बहुत भारी क्या है ? व्यापारियोंके लिए दूर क्या है ? विद्वानोंको परदेश क्या है। मनुस्माथियोंको गैर या पराया कौन है ?

२२

( ३३८ )

केशस्यांगमदत्वां सुखमेव मुखानिनेहलभ्यन्ते ।

मधुभिन्मथनायस्तैराशिलभ्यति वाहुर्भिराक्ष्मीम् ॥

दुरधिगमः परभागो यावत् पुरुषेण साहसं न कृतम् ।

जयतितुलामधिरुद्धे भास्वानिह जलदपटलानि ॥

“इस संसारमें, शरीरको दुःख दिये बिना सुख नहीं मिलता। मधुसूदन भगवान् ने समुद्र मथनेसे थकी हुई भुजाओं द्वारा ही लक्ष्मी पाई।

“जब तक पुरुष साहस न करे, तब तक उसे पराया भाग मिलना कठिन है। तुला राशिको प्राप्त होकर ही सूर्य बादलोंको जीतता है।”

गुणनिधिकी बातें सुनकर रत्नसेन राजी हो गया। दस-बीस लाखका माल देकर उसे विदा कर दिया। कन्दर्पकला पतिके विदेश जानसे दुखी ज़रूर हुई, पर उसने भी रो-घो कर अपनी ओरसे विदाई देदी। सब व्योपारियोंके साथ गुणनिधि विदेश-यात्राको चल दिया।

अपने प्रिय पतिके विदेश चले जाने पर, कन्दर्पकला अपनी स्त्रियोंके साथ चौसर-शतरञ्ज प्रभृति खेल खेल कर दिन काटने लगी। कन्दर्पकला इन दिनों काम-मदसे मतवाठी हो रही थी। एक दिन, सन्ध्याके समय, वह अपनी सखियोंके साथ, महलकी छत पर बैठकर, शतरञ्ज खेल रही थी। महल ठीक ल्बे सड़क था। उसके सामने होकर हज़ारों आदमी और गाड़ी-

( ३३६ )

घोड़े प्रभृति निकल रहे थे। खेळते-खेळते उस मुगशावकनयनी की दृष्टि एक सुन्दर, रूपवान, बलवान, यौवनमदीन्यत गठीले जवान पर पड़ी। क्षण-भरमें उसकी मति बदल गई। वह पति-व्रत धर्मका माहात्म्य भूल कर, व्यभिचार-कर्म करने पर आमादा हो गई। प्रबल कामदेवके वशमें होकर, उसे इस नीच कर्मके परिणामका कुछ भी ध्यान न हुआ। उसने अपने वैभवशाली पिता की इज्जत धूलमें मिलनेका भी विचार न किया। कहा है—

कुलपतनं जनगर्हो, वन्यतमपि जीवितव्यसन्देहम् ।

अंगीकरोति कुलठा, सततं परपुरुषसंस्का ॥

कुलमें दाग लगाना, लोकनिन्दा, बन्धन और जीवनमें सन्देह—इन सबको परपुरुषरता कुलठा खोकार कर लेती है।

बहुत लिखनेसे क्या—वह चञ्चलनयनी अपने कामविकारको न रोक सकी। उसका शरीर कामतापसे जलने लगा, होठ सूखने लगे, दिल धड़कने लगा और कामञ्चर चढ़ आया। उसने कामशास्त्रिके लिए, उस नौजवानको अपने पास बुलानेका विचार स्थिर कर लिया। उसकी अन्तरात्मा—कॉन्शेन्स (conscience) ने उससे कहा—“अधि चपले! आज तू अपने जीवनको भ्रष्ट करने पर क्यों उतारू हुई है? अपना शीलव्रत क्यों भङ्ग करती है? देव, नदी अपनी कठार रूपी मर्यादाका नाश नहीं करती, उसी तरह तुझे भी अपने कुलकी मर्यादा