भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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न जान ले और धर्मशासनसे अनजान रहे, तब तक उसकी शादी न करनी चाहिये ।

पण्डितों की व्यवस्था लेकर सेठने कहा—महाराज ! विद्या पढ़ाने की बात तो मुझे स्वीकार है, पर जितनी विद्या, धर्मनीति और समाजनीति पढ़ाने की बात शाखमें लिखी है, उतना पढ़ने-सीखनेके लिये कम-से-कम दस बरस तो चाहिएँ । अगर कन्दर्पकलाको इतनी ही शिक्षा देने होगी, तो वह कम-से-कम पन्द्रह-सोलह बरस की हो जायगी । उतनी उम्रमें विवाह करनेसे तो हम लोगोंको नरकमें जाना होगा ; क्योंकि शाखमें लिखा है :—

असम्प्रासरजा गौरी, प्राप्ते रजसि रोहिणी ।

अव्यञ्जता भवेत्कन्या, कुवहीना च नयिका ॥

व्यञ्जनैस्तुसमुत्पन्नै, सोमोमुक्तेहिकन्यकाम् ।

पयोधराभ्यां गन्धर्वा, रजस्यसिःप्रतिष्ठितः ॥

तस्माद्विवाहयेत्कन्यां, यावबर्तुमती भवेत् ।

विवाहश्चषष्ठाः कन्यायास्तुप्रशस्यते ॥

व्यञ्जनं हन्ति चै पूर्वं, परं चैव पयोधरी ।

रतिरिष्टास्तथा लोकहृन्याच्चापितरं रजः ॥

श्रुतुभत्यां तु तिष्ठन्त्यां स्वेच्छा दानं विधीयते ।

तस्मादुद्वाहयेत्तथा मनुः स्वायम्बुवोऽववीत ॥