भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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पितृवेशमनि या कन्या रजः पश्यत्यसंस्कृता ।

अविवाहा तु सा कन्या, जघन्यावृषलीस्पृता ॥

जब तक लड़की रजोवती नहीं होती, उसे "गौरी" कहते हैं और रजोवती होनेपर "रोहिणी" कहते हैं। जब तक यौवनके चिह्न प्रकट नहीं होते, उसे "कन्या" कहते हैं और कुछ या स्तन न आने तक "नश्रिका" कहते हैं।

जवानीके चिह्न प्रगट हो जाने पर कन्याको चन्द्रमा भोगता है; स्तन आ जाने पर गन्धर्व और रजोवती हो जाने पर अग्नि भोगता है।

इसलिये कन्याको रजोवती या ऋतुमती होनेसे पहले ही—आठ बरसकी उम्रमें—विवाह देना चाहिये।

स्तनादि स्त्री-चिह्न प्रकट हो जाने पर शादी न कर देनेसे पहलेके पुण्य-कर्म नाश हो जाते हैं; स्तन आ जाने पर विवाह न करनेसे परत्र लभ्य पुण्योंका नाश होता है। सुरत या मैथुन-योग्य होने पर शादी न करनेसे स्वर्ग आदि लोक नहीं मिलते और रजोवती होने पर भी विवाह न कर देनेसे पितर या पुरखे नरकमें जाते हैं, इसलिये स्त्री-चिह्न आनेसे पहले ही कन्या का विवाह कर देना चाहिये।

अगर कन्या शादीसे पहले ही ऋतुमती हो जाय, तो उस का विवाह उसको अनुमतिसे करना चाहिये। स्वायुर्भुव मनुने कहा है, इसलिये कन्याका विवाह उसके नश्रिका या रजोरहित होनेकी हालतमें ही कर देना उचित है।