भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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कला पाँच बरस की हो गई। सेठने कन्या की शिक्षा प्रभुतिके सम्बन्धमें पण्डितोंसे राय ली। पण्डितोंने कहा—“सेठ साहब! कन्याको पहले अच्छी शिक्षा दिलाइये। जिस तरह पुत्रको विद्याभ्यास कराना चाहिये; उसी तरह कन्याको भी विद्या पढ़ानी चाहिये। अशिक्षिता कन्या ग्रहणी रूपी गाड़ीको उचित रूपसे चला नहीं सकती। “हेमाद्री-धर्मशास्त्र”में लिखा है:—

कुमारीं शिष्येद्विद्यां, धर्मनीतीं निवेशयेत् । द्वयोः कल्याणदा श्रोका, या विद्यामधिगच्छति॥

ततो वराय विदुषे, कन्या देया मनीषिभिः । एषः सनातनः पन्था, ऋषिभिः परिगीयते॥

अज्ञातपतिमर्यादाम्, अज्ञातपतितेवनाम् । नोद्गाहयेत पिता बालाम्, अज्ञानधर्मशासनाम्॥

कँवारी कन्याको विद्या पढ़ानी चाहिये और धर्मनीति सिखानी चाहिये, क्योंकि जो कन्या विदुषी होती है, वह मर्ग और बाप—दोनोंके कुलोंका कल्याण करती है।

जब कन्या विद्या और धर्मनीतिमें दक्ष हो जाय, तब किसी विद्वान् वरके साथ उसका विवाह कर देना चाहिये। ऋषियोंने यही सनातन रीति बतलाई है।

जब तक कन्या पति की मर्यादा और पतितेवा की विधि