भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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कारनीगो और फोर्ड भी उसके सामने तुच्छ थे। भारतमें तो आजकल वैसा धनी मशाल लेकर दूँहनेसे भी न मिलेगा। उसके धनका अन्दाज़ा इसीसे लगा लीजिये, कि वह नित्यप्रति नौ लाखका एक रत्न-जटित कम्बल ओढ़ता और सवेरा होते ही उस कम्बलकी रङ्गम गुरीबोंको बाँट दी जाता थी।

संसारमें सर्वसुखी कोई नहीं रहता। भगवान्ने सुखिया-से-सुखियाके पीछे एक न एक दुःख लगा रखा है। यद्यपि रत्नसेन सारे भारतमें अद्वितीय धनशाली था। उसके सुख-वेमवको देख कर स्वर्गके देवताओंको भी ईर्ष्या होती थी। पर रत्नसेन, अटूट धन-सम्पत्ति होने पर भी, सन्तानके लिए दुखी रहता था ; क्योंकि इस अपार सम्पत्तिको भोगनेवाला कोई न था। उसने सन्तानके लिये तन्त्रमन्त्रके जाननेवाले पण्डितोंसे अनेकों यह, हवन और अनुष्ठान कराये। इन सब कर्मकाण्डोंके फलस्वरूप या पूर्वजन्मके पुण्योंका समय आनेसे, उसके एक अपूर्व रूप-लावण्यवती परमा सुन्दरी कन्याने जन्म लिया। सेठके महलों में नौबत बजने लगी। गुरीब और मुहताज़ोंको इतना धन लुटाया गया कि, उस नगरमें एक भी कँगाल न रहा। कितने ही जन्म-दरिद्री तो लखपती बन गये।

रत्नसेनने उस कन्याका नाम कन्दर्पकला रखा। जन्मसमये एक कन्या पानेसे, सेठ उसका ठालन-पालन राजकुमार और राजकन्याओंसे भी अच्छा करने लगा। कन्या भी चन्द्रकलाकी तरह बढ़ने लगी। समय बीतते क्या देर लगती है ? कन्दर्प-