भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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महाकवि कालिदास स्त्रियोंके मनमोहन रूपसे खुश और उनके हृदय की कठोरतासे दुःखित होकर कहते हैं :—

इन्दीवरेण नयनं मुखमंजुजेन कुन्देन दन्तमधरं नवपल्लवेन । अंगानि चम्पकदलैः स विद्याप्रवेशा कान्ते ! कथं घटितवानुपलेनचेतः ।

हे प्यारी ! उस ब्रह्माने, नील कमलसे नेत्र, कमल सा मुख, कुन्दसे दाँत, नये पत्तों जैसे होठ और चम्पाके पत्तोंके समान अन्यान्य अङ्ग बनाकर, स्त्रीका हृदय पत्थरसे क्यों बनाया ?

स्त्रियोंका हृदय पत्थरके समान होता है, इसमें शक नहीं। इस हृदयके कठोर होनेके कारणसे ही उनमें दया, वफा और मुहब्बत नहीं होती। जो उनके ऊपर जान देता है, जो उनकी इच्छा पूरी करनेके लिये दिन-को-दिन और रात-को-रात नहीं समझता, जो उनके लिए घोर परिश्रम करता और तरह-तरह की ज़िल्लते सहाता है, उनको धन और गहने देता, उनका मान रखता और खुशामद करता एवं रतिकीड़ासे उनको अच्छी तरह सन्तुष्ट करता है, उसको भी वे निर्दयता-पूर्वक, जरा सी देरमें, त्याग कर बली जाते हैं। ऐसे स्त्रियोंका हृदय यदि पत्थरका नहीं, तो किसका है ?

दोहा ।

अधरन में अमृत बसत, कुच कठोरता वास ।

यातें इनको लेत रस, उनको मर्दन त्रास ॥८२॥