भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 385

( ३२६ )

अनित्यानि शरीराणि, विभवे नैव शाश्वतः ।

नित्यं सविहतो मृत्युः, कर्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥

शरीर अनित्य है—हमेशा नहीं रहेगा, ऐश्वर्य्य भी सदा नहीं रहेगा और मृत्यु सदैव निकट है, इसलिये धर्म संग्रह करो ।

यस्य धर्मविहीनानि दिनान्यायान्ति यान्ति च ।

स लोहकारेभस्त्रेव श्वसनपि न जीवति ॥

धर्मके बिना जिसके दिन आते और जाते हैं, वह लुहार की धौकनीकी तरह साँस लेता हुआ भी नहीं जीता ।

---*---

मधु तिष्ठति वाचि योषितां हृदि हलाहलमेव केवलम् ।

अतएव निपीयतेऽथरो हृदयं मुग्धिभिरैव ताव्यते ॥८२॥

स्त्रियोंकी बातोंमें अमृत और हृदयमें हलाहल विष होता है ; इसीलिए पुरुष उनका अधरामृत पान करते और उनकी छान्तियोंको मर्दन करते हैं ।

खुलासा—मनुष्य का स्वभाव है कि, वह अमृतको शौकसे पीता और विषसे घृणा करता है ; इसलिये पुरुष स्त्रियोंके नीचले होठोंको चूसते और उनके कुचोंको मलते (पीटते) हैं ; क्योंकि उनके होठोंमें अमृत और कुचोंके नीचे हृदयमें विष रहता है ।

शृंगार शतक · पृष्ठ 385, कुल 544 में से · BharatKosha