भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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पृष्ठ 384

( ३२५ )

बकौल मौलाना हाली—

रंजिशो इलतफातो नाजो निथाज ।

हमने देखे धृहत नशेवो फराज ॥

सुख-दुख, मिलन और विरह प्रभृति संसारके उतार-चढ़ाव हमने खूब देख लिये। अब हमारी तो यह राय है कि, इस संसारमें अपना कोई नहीं है। सभी अपना-अपना मतलब गाँठ-नेको हमारे बने हुए हैं। सच्ची मुहब्बत किसीमें भी नहीं। यद्यपि दुनिया धोखेकी टट्टी है, तोभी सारा संसार इसमें फँसा हुआ है। क्या किया जाय, बिना फँसे काम भी तो नहीं चलता। सब फँसते हैं, पर कोई दाना—चिचाखान नहीं फँसता। जो नहीं फँसता, वही इह लोक और परलोकमें सुख पाता है। किसी कविने खूब कहा है—

दुनिया ने किसका, राहें फ़नामें दिया है साथ ?।

तुम भी चले चलो यूँही, जब तक चली चले ॥

संसारने किसीका साथ नहीं दिया। इसलिये जबतक यह चल रहा है तुम भी चले चलो—इससे दिल मत लगाओ। दिल लगाओ तो—इसके बनानेवालेके साथ लगाओ; क्योंकि अन्तमें वही दयामय काम आयेगा। यों तो वह दयामय जेमाँत्मा और पापात्मा सभी पर दया करता है, पर धर्मात्मा उसे विशेष प्यारे हैं। इसलिये धर्म संग्रह करना चाहिये। कहा है:—

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